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Rajasthan Panchayat Election : अब पंचायत चुनाव में उतरेंगे 14 बार चुनाव हारे 59 वर्षीय ‘पोपटलाल’! क्या 15वीं बार में खुलेगा जीत का खाता?

Real-Life Popatlal of Rajasthan | राजस्थान के पोपटलाल सरगरा जो 14 बार चुनाव हारने के बाद भी नहीं माने। कांग्रेस नेता हरीश चौधरी के बयान के बाद एक बार फिर सुर्खियों में आए।
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दिलचस्प है 59 वर्षीय पोपटलाल का चुनाव लड़ने का जूनून

राजस्थान के ग्रामीण अंचलों में पंचायती राज चुनावों की सरगर्मी के बीच एक ऐसा चेहरा फिर से सुर्खियों में आ गया है, जिसकी जिद और चुनाव लड़ने का जज्बा हर किसी को हैरान कर रहा है। बालोतरा जिले के समदड़ी क्षेत्र के रहने वाले 59 वर्षीय पोपटलाल सरगरा एक बार फिर राजनीतिक गलियारों में चर्चा का केंद्र बन गए हैं। पोपटलाल वो शख्स हैं जिन्होंने अपने जीवन में सरपंच से लेकर विधायक और लोकसभा तक के कुल 14 चुनाव लड़े हैं और हर बार उन्हें हार का सामना करना पड़ा है, लेकिन इसके बावजूद उनके हौसले और चुनाव लड़ने के जुनून में कोई कमी नहीं आई है।

बुधवार, 14 अक्टूबर को पोपटलाल अचानक तब एक बार फिर सुर्ख़ियों में आ गए जब कांग्रेस पार्टी द्वारा पंचायत राज चुनावों की रणनीति को लेकर बुलाई गई एक महत्वपूर्ण बैठक के दौरान वरिष्ठ कांग्रेस नेता और बायतु विधायक हरीश चौधरी ने उनका विशेष तौर पर जिक्र किया। हरीश चौधरी के उस बयान के बाद, जिसमें उन्होंने पोपटलाल के चुनाव लड़ने के शौक पर चुटकी ली थी, यह अनोखा किस्सा पूरे प्रदेश में वायरल हो गया है।

14 बार चुनावी रण में उतरे, हर बार मिली हार- फिर भी नहीं मानी हार

पोपटलाल सरगरा का चुनावी सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। अब तक के अपने राजनीतिक सफर में वे कुल 14 बार जनप्रतिनिधि बनने के लिए मैदान में उतर चुके हैं। उनके चुनावी रिकॉर्ड पर नजर डालें तो उन्होंने 5 बार सरपंच पद के लिए, 4 बार विधानसभा चुनाव में, 4 बार लोकसभा चुनाव में और 1 बार जिला परिषद सदस्य के रूप में अपनी किस्मत आजमाई है, जिसमें कुछ चुनाव उन्होंने अपनी पत्नी को भी लड़वाए थे, हालांकि वे भी सफल नहीं हो सकीं।

दिलचस्प बात यह है कि पोपटलाल ने कभी भी किसी राजनीतिक दल से टिकट की मांग नहीं की। उनका विश्वास है कि जनता ही असली ताकत है और एक दिन 36 कौम के लोग उनका साथ जरूर देंगे। बिना किसी बड़े तामझाम के, कभी बसों में सफर करके तो कभी पैदल ही घूम-घूमकर अपने लिए वोट मांगना उनकी पहचान बन चुका है।

जमीन और जानवर बेचे, परिवार ने भी अब मान लिया है हार का जूनून

चुनावी खर्च उठाने के लिए पोपटलाल कोई बड़ा फंड या चंदा नहीं जुटाते हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, वे 5 साल तक थोड़ा-थोड़ा पैसा जोड़कर चुनाव के लिए पूंजी इकट्ठा करते हैं। चुनाव लड़ने के लिए उन्हें अपने घर के पालतू जानवरों से लेकर अपनी जमीन तक बेचनी पड़ी है।

उनके परिवार की आर्थिक स्थिति काफी साधारण है; उनका बेटा और पत्नी दोनों मेहनत-मजदूरी करके परिवार का गुजारा चलाते हैं। शुरुआत में परिवार के लोग उन्हें चुनाव लड़ने से रोकते-टोकते थे, लेकिन अब वे समझ चुके हैं कि पोपटलाल किसी के रोके नहीं रुकेंगे। प्रचार के लिए वे किसी को साथ नहीं रखते क्योंकि उनका मानना है कि जनता के बीच सीधे संवाद से ही भरोसा बनता है ।

हरीश चौधरी के बयान के बाद गरमाई सियासत

समदड़ी इलाके के इस साधारण व्यक्ति की चर्चा तब और तेज हो गई जब सिवाना विधानसभा क्षेत्र की एक बैठक के दौरान कांग्रेस नेता हरीश चौधरी ने उनका खुलकर जिक्र किया। चौधरी ने कार्यकर्ताओं से चर्चा करते हुए मजाकिया और राजनीतिक अंदाज में कहा था कि जिस व्यक्ति को चुनाव लड़ने की धुन सवार हो जाए, उसका कोई इलाज नहीं है, और यदि पोपटलाल जी का कोई इलाज संभव हो तभी बात बन सकती है।

चौधरी ने कहा कि "पोपटलाल जी ने मेरे सामने चुनाव लड़ लिया, बालाराम जी के सामने लड़ लिया, पंकज प्रताप जी के सामने लड़ लिया, सुनील जी के सामने लड़ लिया, उम्मेद जी के सामने लड़ लिया। ऐसा किसी के मन में हो तो क्या करे, उनको तो ये लगता है हमें चुनाव लड़ना ही लड़ना है।

बार-बार हार मिलने के बावजूद लोकतंत्र के इस सिपाही की जिद और चुनाव लड़ने का यह अनोखा अंदाज अब राजस्थान भर के लोगों के बीच कौतूहल और चर्चा का विषय बना हुआ है।

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