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Rajasthan elections: 1980 के बाद विवाद तो हुए है हर बार इतिहास कहता है… आज जो पार्टी के साथ है कल रहेंगे क्या?

प्रत्याशियों की घोषणा के साथ ही विवाद न हों ऐसा कम ही हुआ है। 1980 से अब तक यही हाल रहा है।

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बाड़मेर। प्रत्याशियों की घोषणा के साथ ही विवाद न हों ऐसा कम ही हुआ है। 1980 से अब तक यही हाल रहा है। पड़ोसी सांचौर जिले में तो सांसद को टिकट देते ही दो दावेदारों ने बगावती सुर दिखा दिए है, बाड़मेर-जैसलमेर की सात में तीन सीट ऐसी है, जहां यह बखेड़ा खड़ा हो जाए तो इनकार नहीं किया जा सकता है। सिवाना में कांग्रेस में एक बनाम अन्य का मामला है। सिवाना पहले से ही बगावती सुरों के लिए सुर्खियों में रही है। बाड़मेर सीट पर भी हर बाद टिकट के बाद अनबन की स्थितियां बनी है। इस बार जैसलमेर के पोकरण में भाजपा के दोनों दावेदारों के समर्थकों में आपस में ठनी हुई है। शिव में भी कमोबेश यही हाल चल रहे है। ऐसे में टिकट के बाद में बखेड़ा खड़ा होने की स्थितियों को लेकर पार्टियां भी स्थितियां भांप रही है।


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यह रहा है इतिहास

1980- कांग्रेस आई से लड़ी अर्स
1980 में कांग्रेस आई और कांग्रेस अर्स दो दल हो गए। कांग्रेस अर्स में पचपदरा से मदन कौर, गुड़ामालानी से गंगाराम चौधरी और चौहटन से अब्दुल हादी कांग्रेस अर्स से चुना लड़े और इस बार तीनों ही हार गए। गंगाराम का गणित यहां फेल हो गया।

1985- लोकदल में चले गए
गंगाराम चौधरी बाड़मेर की राजनीति के धुरंधर रहे। उन्होंने 1985 में लोकदल का साथ दिया। बाड़मेर से खुद गंगाराम चौधरी, चौहटन से अब्दुल हादी, गुड़ामालानी से कैलाश बेनिवाल ने लोकदल से चुनाव लड़ा। हादी और गंगाराम लोकदल से भी जीत गए। कैलाश बेनिवाल को गुड़ामालानी में हेमाराम चौधरी ने हरा दिया।

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1990 - गंगाराम के साथ फिर पलटे
गंगाराम चौधरी ने बाड़मेर से जनता दल, मदनकौर ने गुड़ामालानी से जनता दल, अब्दुल हादी ने चौहटन से जनता दल से चुनाव लड़ा और शिव से हरीसिंह सोढ़ा ने जनता दल से चुनाव लड़ा। जनता पार्टी के इस दल को उस समय गंगादल कहा गया। हरिसिंह के अलावा तीनों ही प्रत्याशी जीत गए। जनता दल की बड़ी कामयाबी यह भी थी कि गुड़ामालानी से जनता दल की जीत हुई।

1993 दो निर्दलीय जीते भगवानदास-गंगाराम
गंगाराम चौधरी बाड़मेर, भगवानदास डोसी चौहटन और अब्दुुल हादी चौहटन ये तीनों ही कांग्रेस से टिकट मांगने पहुंचे। अब्दुल हादी को टिकट चौहटन से मिल गया, लेकिन गंगाराम चौधरी को अशोक गहलोत और भगवानदास डोसी को परसराम मदेरणा ने टिकट देने से मना कर दिया। दोनों ही वापस आकर निर्दलीय चुनाव लड़े और जीत गए। भाजपा समर्थित थे, जो बाद में भाजपा में शामिल हो गए। 1993 में ही हेमाराम चौधरी ने गुड़ामालानी सीट से चुनाव नहीं लड़ा। उन्होंने परसराम मदेरणा के लिए सीट छोड़ी, वे यहां से जीत गए थे।

2003 गंगाराम और अब्दुल हादी
2003 के चुनावों में अब्दुुल हादी और गंगाराम चौधरी की आपस में ठन गई, जब गंगाराम चौधरी ने चौहटन से चुनाव लड़ा। हादी उनके सामने थे। इस दौरान जातिगत वोट तो बंटे ही कांग्रेस का मुस्लिम, मेघवाल, जाट फैक्टर भी टूट गया। कांग्रेस को इस चुनावों में पूरे जिले में नुकसान हुआ। अब्दुल हादी चौहटन से हार गए। शिव से अमीनखां, बाड़मेर से वृद्धिचंद जैन, पचपदरा से मदनकौर, सिवाना से गोपाराम की हार हुई। कांग्रेस के हिस्से केवल एक सीट हेमाराम चौधरी की आई। हेमाराम चौधरी भी 1998 में रिकार्ड 53537 वोटों से जीते थे, जो 11912 वोटों से ही जीते। इस चुनाव में तरूणराय कागा ने निर्दलीय चुनाव लड़ा।

2008 गंगाराम-मृदुरेखा, टीकमकांत-आदूराम
2008 के चुनावों में गंगाराम चौधरी ने बाड़मेर से टिकट मांगा, लेकिन उनकी जगह पर मृदुरेखा चौधरी को टिकट दिया गया। गंगाराम चौधरी ने महापंचायत बुलाई और फिर चुनाव नहीं लड़ा। यहां भाजपा की मृदुरेखा चौधरी हार गई। दूसरा विवाद सिवाना में हुआ, जहां पर भाजपा से प्रमुख दावेदार टीकमचंद कांत को टिकट नहीं देकर आदूराम मेघवाल को दिया गया। टीकमचंद कांत बागी खड़े हुए और यहां से जीत गए। बाद में उनको भाजपा में शामिल कर लिया गया।

2013- मृदुरेखा-प्रियंका, जालमसिंह-मानवेन्द्रसिह
2013 में बाड़मेर से हार चुकी मृदुरेखा चौधरी को टिकट नहीं दिया गया और भाजपा ने प्रियंका चौधरी को टिकट दे दिया। मृदुुरेखा चौधरी इससे नाराज हो गई। उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा और भाजपा की प्रियंका हार गई। इधर, शिव में जालमसिंह रावलोत टिकट के दावेदारों में थे, लेकिन उनकी जगह पर यहां मानवेन्द्रसिंह को भाजपा ने टिकट दिया। जालमसिंह के समर्थकों ने विरोध किया, लेकिन ज्यादा नहीं हुआ। यहां मानवेन्द्र जीत गए।

2018 कर्नल सोनाराम-प्रियंका, पंकज प्रताप-बालाराम
2018 में बाड़मेर से भाजपा ने कर्नल सोनाराम चौधरी को टिकट दे दिया। प्रियंका चौधरी यहां टिकट के दावेदारों में थी। प्रियंका के समर्थक नाराज हो गए। इनको मनाने के असफल प्रयास हुए। इधर, सिवाना में पंकज प्रताप को टिकट दिया गया जो क्षेत्र के लिए भी उस समय एकदम अपरिचित थे। यह टिकट कैसे मिला, किसी को समझ में नहीं आया। इस दौरान टिकट के दावेदार बालाराम और अन्य नाराज हो गए। सिवाना से पंकज हार गए।

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