
गुजरात में बहकर बर्बाद हो रहा राजस्थान के हक का पानी (फोटो-एआई)
बाड़मेर: रेगिस्तान में पानी की कमी इसको नखलिस्तान बनाने के आड़े आ रही है। पर्याप्त पानी मिले तो रेगिस्तान की लाखों बीघा जमीन जो बंजर पड़ी है, वहां पर पेड़ों की श्रृंखला नजर आए। इसी तरह का इलाका लूणी का तट है। बरसाती लूणी नदी आती है, तब पानी नसीब होता है और पंद्रह दिन में यह पानी कच्छ के रण में जाकर खत्म। ऐसे में यहां वनस्पति बड़ी मात्रा में पनपने की स्थिति ही नहीं बनती। इसका हल माही का पानी है, जो राजस्थान के हिस्से का होकर भी गुजरात की खंभात की खाड़ी में फालतू जा रहा है।
बता दें कि माही का 28 एमसीएफटी पानी 1966 के समझौते के मुताबिक राजस्थान के हिस्से का है। यह पानी जालोर, सिरोही और बाड़मेर जिले को मिलना था। चूंकि गुजरात ने अपने हिस्से का केनाल कडाण तक बना लिया और शेष राजस्थान के हिस्से का काम हुआ ही नहीं। राजस्थान की तत्कालीन सरकारों ने इस ओर ध्यान ही नहीं दिया। राज्य के हिस्से का पानी यहां आने के बाद आगे खंभात की खाड़ी में बहा दिया जाता है। न तो यह पानी गुजरात काम में ले रहा है और न राजस्थान को मिल रहा है।
गुजरात के लिए इस पानी को देने में हर्ज नहीं है। क्योंकि गुजरात के टेल एंड कडाण तक यह पानी आ चुका है। आगे गुजरात को पानी की जरूरत नहीं है। राजस्थान को इस पानी की दरकार है। राज्य की ठोस पैरवी और गुजरात से समझौता यह सौगात दे सकता है।
राजस्थान से 15 किमी दूरी पर ही कडाण है। यहां एक केनाल बनाकर इस पानी को राज्य में प्रवेश करवाया जा सकता है। इसके लिए 1977 से लगातार मांग हो रही है। साथ ही जालोर में किसानों ने इसके लिए आंदोलन भी किए, लेकिन नतीजा सिफर रहा है। यह पानी लूणी नदी में भी आ जाता है तो 28 एमसीएफटी साफ पानी से लूणी का प्रदूषित पानी भी खत्म हो जाए और यहां लूणी के दोनों किनारे पर पेड़ों की एक लंबी श्रृंखला लग सकती है।
हाल ही में हरियाणा सरकार से राजस्थान ने समझौता करके शेखावटी के लिए पानी लिया है। इसी मॉडल पर अभी गुजरात में भी भाजपा की सरकार है। राज्य सरकार इसको लेकर पैरवी करे तो यह पानी रेगिस्तान के लिए वरदान साबित हो सकता है।
देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। उनके कार्यकाल में नर्मदा नहर का पानी राजस्थान को मिला था और उस समय राजस्थान में भाजपा की वसुंधरा राजे मुख्यमंत्री थीं। मोदी ने उस समझौते को करके बाड़मेर और सांचौर को बड़ा वरदान दिया। प्रधानमंत्री इस इलाके से वाकिफ हैं और मुख्यमंत्री इसके लिए ठोस पैरवी करें तो 15 किमी का यह मसला हल हो सकता है।
-भोम सिंह बलाई, किसान नेता
Updated on:
15 Jul 2026 08:58 pm
Published on:
15 Jul 2026 08:57 pm
