
केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान में पक्षी। फोटो पत्रिका
National Bird Day : राष्ट्रीय पक्षी दिवस पर विशेष हर वर्ष 5 जनवरी को मनाया जाता है। इस अवसर पर यदि पक्षियों की दुनिया को करीब से देखने और समझने की बात हो तो भरतपुर स्थित केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान का नाम सबसे पहले लिया जाता है। यह वह अनूठी जगह है, जहां देश ही नहीं बल्कि विदेशों से भी लोग पक्षियों को निहारने आते हैं। यहां पक्षियों की अपनी अलग दुनिया है, जो इंसानों की तरह परिवार बनाकर रहते हैं, प्रजनन करते हैं और अपने बच्चों का पालन कर बड़ा करते हैं।
केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान को स्थानीय भाषा में घना कहा जाता है, जो पक्षियों की विविधता के लिए विश्वविख्यात है। यहां देशी और प्रवासी दोनों प्रकार के पक्षी पाए जाते हैं। सर्दियों के मौसम में हजारों किलोमीटर का सफर तय कर प्रवासी पक्षी यहां पहुंचते हैं, क्योंकि केवलादेव का वातावरण, जल क्षेत्र और भोजन की उपलब्धता उनके लिए अनुकूल है।
विदेशी पक्षी यहां अलग-अलग कॉलोनियों में रहते हैं, अंडे देते हैं और अपने बच्चों को उड़ान भरने लायक बनाने के बाद तीन से चार माह में वापस अपने देश लौट जाते हैं। यहां पक्षियों के बीच अद्भुत सामंजस्य और प्रेम देखने को मिलता है। अलग-अलग प्रजातियां अपनी-अपनी कॉलोनियों में रहती हैं, लेकिन एक-दूसरे को नुकसान नहीं पहुंचातीं।
यही वजह है कि केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान को पक्षियों के लिए सुरक्षित और शांत आशियाना माना जाता है। यह अभयारण्य न केवल भारत का गौरव है, बल्कि सेंट्रल एशियन माइग्रेटरी फ्लाईवे पर स्थित होने के कारण वैश्विक पक्षी प्रवासन तंत्र में भी इसका विशेष महत्व है।
घना निदेशक चेतन कुमार बीवी ने बताया कि केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान की भौगोलिक स्थिति इसकी सबसे बड़ी ताकत है। यह सेंट्रल एशियन माइग्रेटरी फ्लाईवे पर स्थित है, जो रूस, मध्य एशिया, चीन, मंगोलिया और यूरोप के उत्तरी भागों से शुरू होकर भारत के पश्चिमी और मध्य हिस्सों से होते हुए दक्षिण भारत-मालदीव तक जाता है। इस लंबे प्रवासी मार्ग पर केवलादेव एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, जहां पक्षियों को भोजन, पानी और विश्राम की बेहतर सुविधा मिलती है। इसी कारण हर साल हजारों प्रवासी पक्षी यहां सर्दियां बिताने आते हैं।
अक्टूबर से मार्च तक का समय केवलादेव में पक्षी महाकुंभ जैसा होता है। इस दौरान साइबेरिया, कजाकिस्तान, रूस, मंगोलिया, अफगानिस्तान और तिब्बत जैसे देशों से आए प्रवासी पक्षी यहां डेरा डालते हैं। इनमें ग्रे लेग गूज, रूडी शेल्डक, पेलिकन, पेंटेड स्टॉर्क, कॉमन क्रेन, फ्लेमिंगो, स्पूनबिल, कॉमन टील, गैडवाल, नॉर्दर्न शॉवेलर, कॉमन पोचार्ड और गर्गनी टील जैसी 150 से अधिक विदेशी प्रजातियां शामिल हैं। कुल मिलाकर यहां 350 से ज्यादा प्रजातियों के हजारों पक्षी देखे जाते हैं।
केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान में कई प्रजातियों के पक्षी पेड़ों पर नेस्टिंग कर अपने घरौंदे तैयार करते हैं। पेंटेड स्टॉर्क, स्पूनबिल, ओपनबिल्ड स्टॉर्क (खुली चोंच वाला सारस), स्नेक बर्ड (भारतीय डार्टर), कार्मोरेंट एवं बगुले सहित अन्य पक्षी आस-पास के पेड़ों की टहनियां जुटाकर सुरक्षित घोंसले बनाते हैं। यही घोंसले उनकी संतानों की पहली पाठशाला बनते हैं, जहां जीवन की नई उड़ान तैयार होती है।
Updated on:
5 Jan 2026, 11:57 AM IST
Published on:
5 Jan 2026, 11:54 AM IST
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