
भिलाई. मां के पास ना लोरी सुनाने का टाइम है, और ना ही बच्चों को मां के आंचल में छिपने का वक्त मिल पाता है। फील्ड पर तेज तर्रार महिला पुलिस ऑफिसर्स का मन उस वक्त अपने बच्चों के लिए कचोटता है। जब उसे मां की जरूरत होती है। कई बार गश्ती में भी बच्चों को साथ लेकर जाती है ताकि नींद में ही सही पर वह मां के करीब रह सकें।
मदर्स डे पर पत्रिका ने महिला पुलिस ऑफिसर्स से जब उनके मां बनने के अहसास को जाना तो कुछ की आंखें भीग गई तो किसी की आवाज भारी हो गई। वे कहती हैं कि मां बनना सबसे सुखद अहसास है पर बच्चों के लिए समय नहीं निकाल पाना उनकी सबसे बड़ी मजबूरी है।
जिले की तेजतर्रार एडिशनल एसपी सुरेशा चौबे के लिए मां बनना जैसे नया जीवन पाना है। अपनी दो साल की नन्ही परी आव्या के साथ जब वे होती हैं तो वे एक मां बनकर नहीं बल्कि बच्ची बनकर साथ रहती है, वे बताती हैं कि बेटी के आने के बाद जैसे दुनिया ही बदल गई। ससुराल में बहू से पोती की मां का ओहदा मिल गया। उनकी ममता पर जिम्मेदारियां कई बार भारी पड़ जाती है।
कई घंटे अपनी दुधमुंही बच्ची को छोड़कर उन्हें फील्ड पर रहना पड़ता है और जब वे लौटतीं हैं तो छोटी सी बेटी उन पर अपना गुस्सा भी दिखाती है। पर उस गुस्से में भी प्यार होता है। सुरेशा का मानना है कि मां बनना तो आसान है पर मां की जिम्मेदारी निभाना कठिन है, लेकिन इस सब के बीच वे अपना क्वालिटी टाइम बेटी आव्या को देती हैं। वे कहती हंै कि बेटी जिस उम्र में है उस वक्त सबसे ज्यादा मां की जरूरत होती है, लेकिन वे हमेशा उसके पास नहीं होती इस बात की गिलटी भी उन्हें हमेशा रहती है। वे कहती हैं कि वे एक सफल अधिकारी तो बन गई पर सुपर मॉम बनना अभी बाकी है।
डीएसपी अनामिका कहती है कि जिस तरह उनकी मां ने उन्हें संभाला, प्यार दिया और ममता लुटाई वैसा वें अपने बेटे के साथ नहीं कर पाती। इस बात का मलाल है, लेकिन खुशी भी है कि उनका चार वर्ष का बेटा समझ गया है कि उसकी मम्मी पर ऐसी जिम्मेदारियां है जो उससे पहले आती है। डीएसपी अनामिका जैन का सफर भी कुछ ऐसा ही है। डीएसपी की एकेडमिक ट्रेनिंग के लिए अपने सात महीने के दुधमुंहे बच्चे को छोड़कर जाना अनामिका के लिए आसान नहीं था।
चंद महीने में उनका बेटा यह भूल गया कि वह उसकी मां है। बेटे को यह समझाने में ही उन्हें सालभर लग गया कि वे उसकी मम्मी है। ट्रेनिंग के दौरान वे सप्ताह में एक दिन ही घर आ पाती थी। पहली पोस्टिंग बेरला में हुई तो रात की गश्त में वे बेटे को साथ लेकर जाती थी। ताकि रात के वक्त साथ रह सकें। अनामिका बताती हैं कि बेटे को जब समझ आने लगा कि मम्मी छोड़कर ड्युटी चली जाएगी तो वह रात को सोते वक्त उनके बाल पकड़कर सोने लगा और उसकी यह आदत आज भी कायम है।
4 साल के शिव को वे आज भी ज्यादा वक्त नहीं दे पाती। पैरेंट्स भी इतने दूर है कि घर पर बेटे के केयरटेकर के सहारे छोडऩा पड़ता है। उनका कहना है कि पुलिस की सर्विस में लेडिज ऑफिसर्स के लिए सबसे बड़ा चैलेंज अपने बच्चों की परवरिश ही है। भट्ठी थाना प्रभारी मोनिका पांडेय कहती हैं कि वे खुद को सुपर मॉम नहीं मानती पर अपनी मां (शैल शर्मा) को सुपर मॉम का दर्जा जरूर देती है, क्योंकि उनकी वजह से उनके बेटे अभिनव पर ममता बरस रहीं है।
वह कहती हैं कि वर्किंग मदर्स के लिए बच्चों को क्वाटिंटी समय देने को लेकर परेशानी होती है, लेकिन यह मां के ऊपर होता है कि वे कम समय में भी छोटी-छोटी खुशियों को कैसे समेटे। वे बताती हैं कि बेटे के जन्म के बाद से ही उनकी मां साथ है। सबसे बड़ी खुशी इस बात की है कि वे बेटे को उनसे ज्यादा उनकी ममता और दुलार मिल रहा है।कई बार ऐसा होता है कि बेटा बीमार होता हैं और वे अपनी डयूटी पर होती हैं।
मोनिका ने बताया कि बेटे के जन्म के तीन महीने बाद ही उन्हें थाना प्रभारी की जिम्मेदारी मिली। उन दिनों वे रायपुर में थी। उन्होंने थाने के सामने ही मकान किराए पर लिया। ताकि बेटे की देखभाल कर सके। अब वह 12 साल का हो चुका है और समझने लगा है, फिर भी बेटे को तो मां चाहिए। अब तो ऐसा होता है कि जब भी वक्त मिलता है। यूनिफार्म पहने हुए ही उसे साथ लेकर शॉपिंग से लेकर स्कूल की पैरेंट्स मिटिंग में पहुंच जाती हूं।
Published on:
13 May 2018 01:22 pm
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