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Bhilai News: अब शरीर में खुद घुल जाएंगे हड्डियों के प्लेट-स्क्रू, दूसरी सर्जरी की जरूरत होगी खत्म,

Bhilai News: हड्डी टूटने पर डॉक्टर प्लेट, स्कू्र या स्टेंट का इस्तेमाल करते हैं ताकि टूटी हड्डी को सहारा मिल सके। लेकिन इलाज पूरा होने के बाद इन्हें निकालने के लिए मरीज को दोबारा सर्जरी करानी पड़ती है।

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भिलाई

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Love Sonkar

May 09, 2026

Bhilai News: अब शरीर में खुद घुल जाएंगे हड्डियों के प्लेट-स्क्रू, दूसरी सर्जरी की जरूरत होगी खत्म,

आईआईटी भिलाई (Photo Patrika0

Bhilai News: आईआईटी भिलाई के वैज्ञानिकों ने मेडिकल साइंस के क्षेत्र में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है। संस्थान के शोधकर्ताओं ने ऐसी अत्याधुनिक तकनीक विकसित की है, जिससे हड्डियों में लगाए जाने वाले प्लेट, स्क्रू और अन्य मेडिकल इम्प्लांट इलाज पूरा होने के बाद शरीर में धीरे-धीरे स्वयं घुल जाएंगे। इससे मरीजों को दोबारा ऑपरेशन कर इम्प्लांट निकालने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

यह शोध डॉ. जोस इमैनुएल और रिसर्च स्कॉलर विग्नेश आर ने संयुक्त रूप से किया है। शोधकर्ताओं ने मैग्नीशियम मिश्र धातु पर टाइटेनियम की बेहद पतली और मजबूत परत चढ़ाने की विशेष तकनीक विकसित की है, जिससे इम्प्लांट शरीर के भीतर अधिक समय तक सुरक्षित और मजबूत बना रहता है।

सामान्य तौर पर हड्डी टूटने पर डॉक्टर प्लेट, स्कू्र या स्टेंट का इस्तेमाल करते हैं ताकि टूटी हड्डी को सहारा मिल सके। लेकिन इलाज पूरा होने के बाद इन्हें निकालने के लिए मरीज को दोबारा सर्जरी करानी पड़ती है। इससे दर्द, संक्रमण का खतरा और अतिरिक्त खर्च बढ़ जाता है। नई तकनीक के जरिए तैयार इम्प्लांट शरीर में आवश्यक समय तक मजबूत बना रहेगा और बाद में धीरे-धीरे शरीर में घुल जाएगा। इससे दूसरी सर्जरी की आवश्यकता लगभग समाप्त हो सकती है।
मैग्नीशियम और टाइटेनियम का अनोखा संयोजन

वैज्ञानिकों के अनुसार मैग्नीशियम शरीर के लिए सुरक्षित धातु मानी जाती है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि यह शरीर के भीतर तेजी से क्षरित हो जाती थी। तेज क्षरण के कारण इम्प्लांट समय से पहले कमजोर पडऩे का खतरा रहता था। इस समस्या को दूर करने के लिए शोधकर्ताओं ने मैग्नीशियम पर टाइटेनियम की विशेष कोटिंग विकसित की। परीक्षण में पाया गया कि नई तकनीक से धातु के खराब होने की गति में उल्लेखनीय कमी आई। पहले जहां धातु 7.66 मिलीमीटर प्रतिवर्ष की दर से क्षरित होती थी, वहीं नई तकनीक के बाद यह दर घटकर 2.93 मिलीमीटर प्रतिवर्ष रह गई। इससे इम्प्लांट लंबे समय तक मजबूती बनाए रखेगा और हड्डियों को पूरी तरह जुडऩे के लिए पर्याप्त समय मिलेगा।

बुजुर्ग और गंभीर मरीजों के लिए राहत

शोधकर्ताओं का मानना है कि यह तकनीक भविष्य में ऑर्थोपेडिक उपचार को अधिक सुरक्षित और किफायती बना सकती है। खासतौर पर बुजुर्गों, गंभीर चोट वाले मरीजों और बार-बार सर्जरी से बचने वाले रोगियों के लिए यह तकनीक बेहद उपयोगी साबित हो सकती है। डॉ. जोस इमैनुएल ने बताया कि यह भारत में लंबे समय तक टिकाऊ जैव-अपघटनीय मेडिकल इम्प्लांट विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

अंतरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित हुआ शोध

यह शोध हाल ही में डिस्कवर मटेरियल्स में प्रकाशित हुआ है। अब शोधकर्ता प्रयोगशाला में कोशिकाओं की वृद्धि पर इसका प्रभाव अध्ययन करेंगे, जिसके बाद पशुओं पर परीक्षण शुरू किए जाएंगे।