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राजस्थान के इस जिले पर ‘मानसून‘ बन सकता है खतरा, अगर हुआ मेहरबान तो बह जाएंगे कई गांव!

मानसून में अच्छी बरसात होते ही जिले के करीब 12 बांधों पर खतरा मंडराने लगता है

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Can be evacuated village in bhilwara

Can be evacuated village in bhilwara

भीलवाड़ा।

मानसून में अच्छी बरसात होते ही जिले के करीब 12 बांधों पर खतरा मंडराने लगता है। हर बार करीब 1 5 गांवों को खाली कराने जैसे हालात बनते हैं। मंत्री व अफसर एेनवक्त पर भागते हैं लेकिन समस्या का स्थाई समाधान नहीं हो रहा है। यह हालात जिले के बांधों के कारण है। अभी जिले में 63 बांध है। इनमें से करीब 12 बांध एेसे है जिन्हें मदद की जरुरत है। कहीं गेट क्षतिग्रस्त है तो कहीं पाल जर्जर है।

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एेसे में यदि समय रहते नहीं चेते तो फिर से खतरा हो सकता है। करीब एक माह बाद मानसून दस्तक देगा, लेकिन जिले में बांधों और तालाबों की मरम्मत करवाने की फुर्सत जल संसाधन के किसी के पास नहीं है। बरसों पूर्व जलाशयों के निर्माण के बाद लावारिस हाल में छोड़कर अधिकारी चादर तान सो गए। एक दशक में बांधों और तालाबों की मरम्मत के नाम पर केवल उनके गेट पर ऑयल-ग्रीस का काम हुआ जबकि कई बांध और तालाब को मरम्मत की दरकार है।

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पंचायत व जल संसाधन विभाग एक-दूजे पर डालते हैं जिम्मेदारी

जिले में वर्तमान में जल संसाधन विभाग 63 बांधों की देखरेख कर रहा है। राज्य सरकार ने 300 हैक्टेयर तक सिंचाई क्षमता वाले बांधों को पंचायतों को सौंप रखे हैं। ग्राम पंचायतों के अधीन छोटे-बड़े 450 बांध और तालाब है। पहले सभी जलाशय जल संसाधन विभाग के पास थे। लेकिन उचित रखरखाव नहीं होने के कारण पंचायतों को सौंप दिए गए। अब हालात में परिवर्तन नहीं आया। न जल संसाधन विभाग अपने जलाशयों की सुध ले रहा है ना ही पंचायत। इसके पीछे बड़ा कारण सरकार की ओर से बजट का अभाव है। पंचायत के भी कुछ इसी तरह के हाल है। पंचायत की माली हालत के कारण सरकार पर निर्भर होना पड़ता है। हर साल दस करोड़ रुपए मांगे जाते है। हकीकत में एक करोड़ भी पंचायत को नहीं मिलते।


खुले नहीं गेट तो फूली सांसे, आखिर मिली राशि

जेतपुरा बांध के रखरखाव पर ध्यान नहीं दिया। तीन साल पूर्व बांध के लबालब होने के बाद फूटने के अंदेशे से गेट खोलकर पानी निकासी की कोशिश की। गेट नहीं खुलने पर पानी गेट के ऊपर से बाहर आ गया। पाल के फूटने के अंदेशे पर एक दर्जन गांवों को खाली करवाया। उसके बाद सरकार ने इसकी मरम्मत के लिए 15 करोड़ रुपए स्वीकृत किए है।

वहां गेट बदल दिए गए। इसी तरह वर्ष-2007 में बिजौलियां के निकट जूट का नाका बांध का दंश जिला झेल चुका है। उस समय बांध लबालब हुआ। लेकिन पाल ढहने से पानी निकल गया। आसपास के गांव डूब गए तो सिंचाई और पेयजल की समस्या खड़ी हो गई।
डोहरिया, देवरी नाला, नवलपुरा, गोवटा, डामटी कोकरा, रायथलियास, जेतपुरा लड़की बांध सहित कई तालाबों और बांधों को मरम्मत की आवश्यकता है। मेजा बांध में वर्ष-2006 में लबालब होने की स्थिति में पाळ से रिसाव हुआ। कुछ बाधों और तालाबों पर सुरक्षाकर्मी तैनात है। बाकी पर सुरक्षा के नाम पर कागजों में खानापूर्ति की जा रही है।


इसलिए भी जरूरी
इस समय कई बांध 4 से 5 दशक से ज्यादा पुराने है। मानसून के दौरान अतिवृष्टि होते ही पाल से पानी रिसाव शुरू हो जाता है। नहरें तक क्षतिग्रस्त हो रही है। इस समय 14 बांधों के रखरखाव और मरम्मत के लिए विभाग ने बजट के लिए प्रस्ताव मुख्यालय भेज रखा है। कई बांधों के लिए बजट स्वीकृत हो गए तो उसकी प्रशासनिक स्वीकृति नहीं मिली।


गला घोंट दिया एनिकटों ने
भराव क्षेत्र में एनिकटों की भरमार ने पानी का बहाव रोककर जलाशयों का गला घोट दिया है। एनीकटों के भरने के बाद ही पानी आगे बढ़ पाता है। लेकिन इतनी बरसात नहीं हो पाती है कि एनीकट भर पाए। ऐसे में बांध और तालाब पानी को तरसते रहते है।


ये आ रहे काम
लगभग सभी बांध और तालाब सिंचाई और पेयजल के लिए का काम में आ रहे है। पर्याप्त पानी आने पर सिंचाई के लिए पानी छोड़ा जाता है। अन्यथा उसे पीने के लिए सुरक्षित रखा जाता है।