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Rajasthan: 75 साल के रमेश चंद्र हैं ‘रौबदारों के मास्टर’, काम सुनकर आप भी करेंगे जज़्बे को सलाम!

20 साल सेना पुलिस में की वर्दी की सिलाई 16 साल की आयु से कर रहे सिलाई का काम, 75 की उम्र में भी वही जज्बा

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भीलवाड़ा/कानाराम मुण्डियार. क्या हमने कभी सोचा है कि पुलिस की जिस खाकी वर्दी के रौब से शातिर-बदमाश कांपने लगते हैं, उस वर्दी की सिलाई कहां और कैसे होती है। दरअसल में पुलिस की वर्दी किसी फैक्ट्री या कम्पनी में नहीं बनती, बल्कि घर-दुकान में कार्य करने वाले सामान्य दर्जी ही वर्दी की सिलाई करते हैं।

यह बात अलग है कि कुछ दुकानों पर दर्जी केवल वर्दी सीलने का काम ही करते हैं। भीलवाड़ा में 75 वर्षीय रमेशचंद्र छीपा भी ऐसे दर्जी हैं, जो 48 साल से केवल पुलिस वर्दी की सिलाई कर रहे हैं। उम्र बढऩे के साथ सिलाई की गति थोड़ी कम हो गई हैं, लेकिन रौबदार वर्दी सिलने का जज्बा कम नहीं है। जवान से लेकर बड़े अधिकारी तक छीपा से ही वर्दी सिलवा कर रौबदार बनते हैं।

जानकारी के अनुसार रमेशचन्द्र 16 वर्ष की आयु से पुश्तैनी दर्जी का कार्य कर रहे हैं। वे 20 साल सेना पुलिस में तैनात रहे। वहां सेना पुलिस की वर्दी सिलाई करते थे। तब से केवल वर्दी सिलते आ रहे हैं। सेना पुलिस से सेवानिवृत्त होने के बाद 28 साल पहले भीलवाड़ा आ गए और यहां पुलिस की वर्दी सिलाई की दुकान शुरू की।

तब भीलवाड़ा के बाजार में पुलिस की वर्दी सिलाई की एक दुकान ही थी। अब शहर में वर्दी सिलाई की दुकानें बढ़ गई है। रिटायरमेंट के बाद छीपा ने पुलिस लाइन के पास दुकान शुरू करने के बाद एक सहयोगी लगा दिया। भीलवाड़ा पुलिस लाइन के अधिकतर पुलिस जवान व अधिकारियों की वर्दी इनके पास सिलने आने लगी। उम्र बढ़ती गई तो रमेशचन्द्र ने केवल कंटिंग का काम जारी रखा और सिलाई अन्य सहयोगी व पुत्र से करवानी शुरू कर दी। बड़े बेटे ओमप्रकाश को भी यह कार्य सिखा दिया है।

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बदली हो गई, वर्दी वहीं से सिलवाते हैं
रमेशचन्द्र के अनुसार कई जवानों व अधिकारियों का तबादला हो गया, लेकिन उनमें कई अभी भीलवाड़ा आकर या कपड़ा भेजकर उनसे वर्दी सिलवा रहे हैं। अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक उमेशचन्द्र दत्ता (भीलवाड़ा में एसपी रहे), अति.पुलिस अधीक्षक चंचल मिश्रा व पुलिस उप अधीक्षक गोमाराम चौधरी सहित कई अधिकारी यहां रहकर गए। वर्तमान में अन्य स्थानों पर तैनात है, लेकिन उन्हें भीलवाड़ा से सीली वर्दी ही पसंद आ रही है।

उम्र बढऩे के साथ सिलाई कम
कुछ दशक पहले तक रमेशचंद्र छीपा अकेले एक दिन में दो वर्दी सिलाई कर लेते थे। उम्र बढ़ने के साथ प्रतिदिन एक वर्दी ही सिल पाते हैं। औसतन प्रतिदिन एक हजार रुपए का पारिश्रमिक मिल जाता है।

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पुलिस वर्दी वाली दुकान से पहचान
रमेशचन्द्र स्वभाव से बहुत सरल व सहज है, लेकिन अपने क्षेत्र में पुलिस वर्दी वाले टेलर के रूप में पहचान से गर्व भी होता है। वर्दी सिलाई के कारण पुलिस जवानों व अधिकारियों से मित्रवत्त संबंध भी बने हुए हैं।

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