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लघु-मध्यम उद्योग के सामने कार्यशील पूंजी का संकट

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Working capital crisis in front of small-scale industry

लघु-मध्यम उद्योग के सामने कार्यशील पूंजी का संकट

भीलवाड़ा।

लघु एवं मध्यम उद्योगों के सामने कार्यशील पूंजी का संकट है। बैंक भी इन छोटे उद्योगों को ऋण देने से कतराते हैं। उद्योग चलाने के लिए उन्हें बाजार या साहूकारों से ऋण लेना पड़ता है। इस तरह एक से डेढ़ हजार उद्योग अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

वस्त्रनगरी में लद्यु एवं मध्यम दर्जे के डेढ़ हजार से अधिक उद्योग है। इनमें 15 हजार श्रमिक काम करते हैं। भीलवाड़ा जिले में हजारों छोटे उद्योग है, लेकिन इस श्रेणी के उद्योगों में टेक्सटाइल की छोटी इकाई, टीएफओ, रेडिमेड गारमेन्ट इकाई, विविंग की छोटी इकाईं, ग्राइडिंग उद्योग, इन्सुलेशन ब्रिक्स, सेण्ड स्टोन उद्योग शामिल है। यह उद्योग दस करोड़ तक के दायरे में आते हैं। टेक्सटाइल में विविंग उद्योग में 48 लूम आते ही वह बड़े लार्ज श्रेणी के उद्योग में आ जाते हैं। भीलवाड़ा में एेसे कई उद्योग है। सल्जर लूम की एक मशीन दस लाख व एयरजेट लूम 25 लाख की आती है।

औद्योगिक संगठन के अनुसार हैदराबाद की इण्डियन स्कूल ऑफ बिजनेस के सर्वे में खुलासा हुआ कि 56 प्रतिशत लद्यु एवं मध्यम उद्योग कार्यशील पूंजी के लिए अपने स्तर पर व्यवस्था करते हैं। 19 प्रतिशत को बैंक कार्यशील पूंजी आवश्यकता से कम उपलब्ध कराते हैं।

लघु उद्योगों के लिए क्रेडिट गारंटी निधि ट्रस्ट

केन्द्र ने लघु उद्योग की वित्तीय समस्याओं के निदान के लिए लघु उद्योग क्रेडिट गारंटी निधि ट्रस्ट की स्थापना की थी। लेकिन यह केवल बड़े उद्योगों के लिए फायदा का सौदा साबित हुआ। छोटे उद्योगों के लिए क्रेडिट गांरटी योजना मुश्किल साबित हुई है। ट्रस्ट का मुख्य उद्देश्य क्रेडिट गांरटी योजना का परिचालन है, ताकि औपचारिक बैंकिंग प्रणाली से लघु उद्योगों को प्रतिभूति मुक्त ऋण उपलब्ध हो सके। लेकिन ऐसा नहीं हो सका है।


यह आ रही समस्या

-क्रेडिट गांरटी योजना के बाद भी लघु उद्योग को बाजार से ऋण लेना पड़ता है। जिसमें बैंक से अधिक ब्याज दर होती है।

-इस योजना में कोलेटरल 5 करोड़ तक फ्री है। कोई रहन रखने की जरूरत नहीं है। इसके चलते बैंक अधिकारी ऋण देने में सावधानियां बरतते है। फिर ऋण देते ही नहीं है।

- बैंक लद्यु उद्योगों से उनका इतिहास, अनुभव सहित अन्य दस्तावेज मांगते हैं जबकि इस तरह के उद्योग लगाने वाले के पास मात्र 2 या 3 साल का अनुभव होता है। ऐसे में बैंक ऋण नहीं देता।

- बड़े उद्योगों को रॉ मेटेरियल खरीदने के लिए हर कम्पनी 60 से 90 दिन का समय भुगतान के लिए देती है जबकि लद्यु एवं मध्यम उद्योग को अग्रीम राशि देकर माल खरीदना पड़ता है।
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उद्योग सचिव को लिखा पत्र
लद्यु एवं मध्यम उद्योगों के सामने कार्यशील पूंजी की समस्या रहती है। इसे लम्बे समय से सरकार के सामने उठाया था। इस मुद्दे को फिर से उठाते हुए उद्योग सचिव को इसमें सुधार करने के लिए पत्र लिखा है। -आरके जैन, महासचिव मेवाड़ चेम्बर ऑफ कॉमर्स

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