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विधानसभा परिसर में होगा ‘बिछड़े कई बारी-बारी’ का विमोचन, कोरोनाकाल में दिवंगत पत्रकारों को होगी समर्पित

bichde kai bari bari- विधानसभा परिसर में हो होगा इस पुस्तक का विमोचन, पत्रकारों को की जाएगी समर्पित...।

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भोपाल

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Manish Geete

Dec 18, 2021

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bichde kai bari bari

भोपाल। 'बिछड़े कई बारी-बारी' एक ऐसी किताब है जो दिवंगत हो गए और कोरोना संक्रमण की चपेट में आ गए पत्रकारों की याद दिलाएगी। जाने-माने पत्रकार देव श्रीमाली ने इस पुस्तक का सम्पादन किया है। इसका विमोचन 20 दिसंबर को विधानसभा परिसर में होने जा रहा है। यह पत्रकारों समर्पित की जाएगी।

इस कीताब के बारे में इसके संपादक देव श्रीमाली कहते हैं कि कोरोना काल में कर्तव्य और सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करते-करते संक्रमण की चपेट में आए और फिर दिवंगत हुए पत्रकारों के संघर्ष की कहानी कहती यह पुस्तक देश-दुनिया की पहली पुस्तक है, जो सिर्फ पत्रकारों के योगदान को बयां करती है।

दर्द बयां करती है किताब

कोरोना वायरस ने जिस तरह से पूरे विश्व में मौत का खेल खेला और करोड़ों लोगों की जान ले ली, भारत के साथ ही मध्यप्रदेश भी इससे अछूता नहीं रहा। इस महामारी ने पूरा सामाजिक, शैक्षिक एवं आर्थिक ताना-बाना ध्वस्त करके रख दिया। कुछ वक्त तो यह भी हालात बन गए थे कि मौत, भूख से हो या कोरोना से, लोग चिंता में रहे, क्योंकि एक तरफ बेरोजगारी थी तो दूसरी तरफ कोरोना से जान जाने का डर।

आज भी बरकरार है असमंजस

कोरोना महामारी का असर आज भी है और अब तीसरी लहर की आशंका सिर पर खड़ी है। समाज, सरकार सबने मदद की, हर कोशिश की, नतीजतन थोड़ी राहत तो जरूर मिली, बावजूद इसके अगर सरकारी आंकड़ों को ही मानें तो राज्य में 8 लाख से अधिक लोग इस संक्रमण की चपेट में आए और साढ़े दस हजार से अधिक जानें गईं। हालांकि आंकड़ा इससे कहीं अधिक है, इसका रहस्य बरकरार रहेगा।

सब घरों में कैद थे, पत्रकार सड़कों पर थे

इस महामारी को रोकने के लिए सरकार ने लॉकडाउन किया, कर्फ्यू लगाए, सब लोग घरों में कैद थे, लेकिन पुलिस, प्रशासन, चिकित्सक, चिकित्सा से जुड़े लोग और सफाईकर्मियों के अलावा लोकहित चिंतक पत्रकार यानी मीडिया से जुड़े लोग सड़कों पर थे।

देव श्रीमाली कहते हैं कि फील्ड में उतरे पत्रकार कोविड अस्पतालों में न केवल कवरेज के लिए तत्पर रहे, बल्कि शासन की आवश्यक बैठकों में भी मौजूद रहते थे। यही वजह रही कि साक्षात मौत की सुरंग में काम करते हुए अनेक पत्रकार कोविड-19 के संक्रमण का शिकार होकर मौत की नींद सो गए। इस जानलेवा वायरस की गिरफ्त में मैं भी आया, लेकिन चिकित्सकों का बेहतर इलाज, परिजनों की सेवा और शुभचिंतकों की दुआओं से मौत के मुंह से बाहर निकल आया। एक दौर ऐसा भी आ गया था कि लगा बारी-बारी जिस तरह कोरोना वायरस पत्रकार साथियों को निगल रहा है, उसका हिस्सा कहीं मैं भी न बन जाऊं। देश में तो सैंकड़ों पत्रकार अनंत में विलीन हुए ही, मेरे अपने प्रदेश में अनेक मूर्धन्य पत्रकार असमय चले बसे।

पुस्तक के संपादक श्रीमाली कहते हैं कि "पत्रकारों की इन मौतों ने मुझे झकझोर दिया, क्योंकि मैं जानता हूं पत्रकार के परिवार का अस्तित्व सांस टूटने के साथ ही मिट जाने की हालत में आ जाता है।"

तब किताब का सुझाव पसंद आ गया

देव श्रीमाली बताते हैं कि 'ग्रामीण पत्रकारिता विकास संस्थान' की आपात बुलाई बैठक में मैंने सुझाव दिया कि कोरोनाकाल में मध्यप्रदेश के दिवंगत पत्रकारों का दस्तावेजीकरण हर हाल में किया जाना चाहिए और दिवंगतों की स्मृति अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए एक पुस्तक निकाली जाए। विचार सबको पसंद आ गया, लेकिन मुश्किम काम था, क्योंकि एक तो प्रदेश के कोने-कोने से दिवंगत पत्रकारों का पता करना था, फिर उन पर वहीं के अच्छे पत्रकारों से लिखवाना भी था। शुरू में पता चला कि इस काल में करीब 50 पत्रकारों की मौत हुई है, लेकिन जब काम आगे बढ़ा, तो मैं चौंक पड़ा। मीडिया से कोरोनाकाल खण्ड में 100 से भी अधिक पत्रकार पुनीत दायित्व का निर्वहन करते-करते साथ छोड़ चुके थे। चौंकाने वाला आंकड़ा छिंदवाड़ा जैसे छोटे जिले का था। यहां के 16 पत्रकार दिवंगत हुए।

दिवंगत पत्रकारों को श्रद्धांजलि है यह किताब

श्रीमाली कहते हैं कि दिवंगत पत्रकारों को श्रद्धाजंलि बतौर शब्दांजलि है यह किताब। इस दौर में साथ छोड़ने वाले पत्रकारों के जीवन, व्यक्तित्व, संघर्ष और कोरोनाकाल में उनके परिवारों की तरफ से झेलीं गईं तकलीफों का भी जिक्र किया है। इस पुस्तक में दर्ज कई घटनाएं आपके रोंगटे खड़े कर देंगी, तो कई आंखों में आंसू ला देंगी। इसमें प्रिंट और विभिन्न मीडिया से जुड़े सभी लोगों को शामिल करने का प्रयास किया है, लेकिन अभी भी कुछ नाम छूट गए होंगे। खास बात यह भी है कि इसमें कुछ पत्रकारों के परिचितों और सहयोगियों को भी जगह दी गई है। भले ही वे सीधे तौर पर पत्रकार न भी हो, लेकिन उनके आसपास सदा पत्रकारों का जमघट लगा रहता था और यही माहौल उनके कोरोना संक्रमण की वजह बन गया। इसमें दिवंगत पत्रकारों की संघर्ष और शख्सियत पर प्रमुख पत्रकारों ने कलम चलाकर शब्दांजलि दी है।

परिजनों को हौंसला देगी यह किताब

श्रीमाली कहते हैं कि दिवंगत पत्रकारों के परिवारों को यह पुस्तक हौंसला देगी और समाज इसके जरिये कोरोनाकाल में प्रेस-मीडिया के किए गए कर्तव्य निर्वहन पर अमूल्य योगदान का आकलन कर पाएगा। जब कभी भी कोरोनाकाल का इतिहास लिखा जाएगा तो यह किताब पत्रकारों के योगदान, जिसे मैं शहादत कहूंगा, इसका भी जिक्र करने का मजबूत दस्तावेजी आधार बनेगी।