
election 2018 unlucky seat
भोपाल। मध्यप्रदेश में अब तक जितने भी चुनाव हुए उसमें कई सरकारें बनी और गिर गईं। कई मुख्यमंत्री आए और चले गए। यहां तक कि जो भी मुख्यमंत्री इस शहर में जाता है उसे सत्ता गंवानी पड़ती है। इतना खौफ है कि आमंत्रण पर भी वे कन्नी काट लेते हैं। माना जाता है कि यह शहर मुख्यमंत्रियों के लिए अन-लकी साबित होता है।
mp.patrika.com आपको बता रहा है ऐसे ही अंधविश्वास के बारे में, जो कई मुख्यमंत्रियों की कुर्सी छीन चुका है...।
जी हां, हम बात कर रहे हैं मध्यप्रदेश के अशोकनगर की। जहां आज तक जितने भी मुख्यमंत्री गए, थोड़े दिनों बाद ही कुर्सी छिन गई या सरकारें गिर गईं। इसलिए भाजपा-कांग्रेस के दिग्गज नेता आज भी वहां जाने में डरते हैं।
यह है कुछ उदाहरण
-यह अंधविश्वास 1975 के बाद शुरू हुआ था जब मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी और मुख्यमंत्री प्रकाशचंद्र सेठी थे। इसी वर्ष तत्कालीन मुख्यमंत्री सेठी एक अधिवेशन में हिस्सा लेने अशोकनगर आए थे। इसके थोड़े दिन बाद ही 22 दिसंबर को उन्हें राजनीतिक कारणों से इस्तीफा देना पड़ गया। हालांकि यह पहली घटना थी, इसलिए किसी ने इस अंधविश्वास के बारे में नहीं सोचा था।
श्यामाचरण की भी गई कुर्सी
इसके बाद 1977 में श्यामाचरण शुक्ल मुख्यमंत्री थे और उनके भाई विद्याचरण शुक्ल केंद्र की राजनीति में सक्रिय थे। मुख्यमंत्री रहते हुए श्यामाचरण जब अशोकनगर के तुलसी सरोवर का लोकार्पण करने आए। उसी के दो साल बाद प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लग गया, तो उनकी भी कुर्सी जाती रही। तभी से इस अंध विश्वास ने जोर पकड़ना शुरू कर दिया और नेताओं ने अशोक नगर जाने से परहेज करना शुरू कर दिया।
अर्जुन सिंह की भी गई कुर्सी
इस अंधविश्वास को मानने वाले बताते हैं कि जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह थे। 1985 के दौर में सियासत ऐसी चली कि कांग्रेस पार्टी ने अर्जुन सिंह को मध्यप्रदेश से अलग कर दिया और उन्हें पंजाब का राज्यपाल बना दिया।
जब मोतीलाल वोरा को छोड़ना पड़ी कुर्सी
यह भी माना जाता है कि जब 1988 में कांग्रेस की सरकार थी और मोतीलाल वोरा मुख्यमंत्री थे। एक बार वे तत्कालीन रेल मंत्री माधवराव सिंधिया के साथ रेलवे स्टेशन के फुट ओवर ब्रिज का उद्घाटन करने अशोकनगर स्टेशन आए थे। यह ब्रिज दोनों पर ही भारी पड़ा। थोड़े दिनों बाद ही मोतीलाल वोरा को कुर्सी छोड़नी पड़ गई।
पटवा की भी कुर्सी ऐसे गई
इसके बाद मध्यप्रदेश में भाजपा की सरकार बनी और मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा बने। इस मिथ को मानने वाले बताते हैं कि पटवा जैन समाज के पंच कल्याणक महोत्सव में शामिल होने अशोक नगर आए थे। यह वही दौर था जब अयोध्या में विवादित ढांचा ढहाया जा रहा था। चारों तरफ दंगे भड़क गए और राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। इस दौरान पटवा की भी कुर्सी जाती रही।
दिग्विजय सिंह के साथ भी जुड़ा यह मिथक
मध्यप्रदेश में 10 सालों तक कांग्रेस सरकार में मुख्यमंत्री रहे दिग्विजय सिंह के साथ भी यह मिथ जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि वे 2001 में माधवराव सिंधिया के निधन के बाद खाली हुई सीट पर उनके बेटे ज्योतिरादित्य सिंधिया के लिए चुनाव प्रचार करने के लिए गए थे। ज्योतिरादित्य तो उपचुनाव जीत गए, लेकिन 2003 में दिग्विजय को सत्ता से हाथ धोना पड़ा।
14 सालों में शिवराज कभी नहीं गए अशोकनगर
मध्यप्रदेश में 14 सालों से मुख्यमंत्री पद संभाल रहे शिवराज सिंह चौहान के बारे में बताया जाता है कि वे अब तक अशोकनगर नहीं गए। शिवराज को 24 अगस्त 2017 में अशोक नगर के कलेक्ट्रेट की नई बिल्डिंग के उद्घाटन करने के लिए आमंत्रित किया गया था। आमंत्रण तो स्वीकार कर लिया, लेकिन वे गए नहीं। इसके बाद विपक्षी नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया हमेशा कहते रहे कि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री होने के नाते शिवराज को अशोकनगर का दौरा करना चाहिए। जबकि मुख्यमंत्री जिले की चंदेरी और मुंगावली क्षेत्र में जरूर जा चुके हैं। मुंगावली सीट पर हुए उपचुनाव में प्रचार करने गए थे। इसके बाद वे जनआशीर्वाद यात्रा लेकर गए, लेकिन अशोक नगर से कन्नी काट काटते रहे। माना जाता है कि वे अशोक नगर गए भी और नहीं भी गए।
क्या 11 दिसंबर को टूटेगा ये मिथक
कई सालों से चला आ रहा यह अंधविश्वास क्या वाकई में सही है। क्या यह मिथक वाकई में मुख्यमंत्री की कुर्सी छीन लेता है। क्या अशोक नगर किसी के लिए लकी या अनलकी है। इसी अंधविश्वास का एक टेस्ट 11 दिसंबर को होने जा रहा है। जब मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव के परिणाम आएंगे।
Published on:
19 Oct 2018 04:40 pm
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