कांग्रेस के दो दिग्गज नेताओं की 'चाणक्य नीति' में फिर फंसे ज्योतिरादित्य सिंधिया, एमपी की सियासत से हुए बाहर !

कांग्रेस के दो दिग्गज नेताओं की 'चाणक्य नीति' में फिर फंसे ज्योतिरादित्य सिंधिया, एमपी की सियासत से हुए बाहर !
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Pawan Tiwari | Updated: 23 Aug 2019, 02:12:35 PM (IST) Bhopal, Bhopal, Madhya Pradesh, India

  • ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस के कद्दावर नेता हैं, मनमोहन सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं।

भोपाल. सोनिया गांधी ने कांग्रेस का अंतरिम अध्यक्ष बनने के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया को बड़ी जिम्मेदारी दी है। महाराष्ट्र में इस साल विधानसभा के चुनाव होने हैं और कांग्रेस ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को महाराष्ट्र स्क्रीनिंग कमेटी का चैयरमैन नियुक्त किया है। जानकारों का कहना है सिंधिया को ये जिम्मेदारी देकर मध्यप्रदेश की सियासत से एक बार फिर से दूर किया गया है। ज्योतिरादित्य सिंधिया का नाम मध्यप्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की रेस में है लेकिन इसी दौरान उन्हें महाराष्ट्र में स्क्रीनिंग कमेटी का चैयरमैन नियुक्त कर दिया गया।

 

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कैसे दूर हुए सिंधिया
मध्यप्रदेश विदानसबा चुनाव के पहले कमल नाथ का प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया गया था। प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनी और कमलनाथ मध्यप्रदेश के सीएम बने। सीएम बनने के बाद कमल नाथ के प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफे की अटकलें लगाई गईं, लेकिन तत्कालीन अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा- लोकसभा चुनाव भी कमलनाथ के नेतृत्व में होंगे लेकिन लोकसभा में पार्टी की हार हुई। राहुल गांधी ने हार के बाद पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया फिर कांग्रेस में इस्तीफों का दौर शुरू हो गया। कमल नाथ ने भी अध्यक्ष पद से इस्तीफे की पेशकश की उसके बाद से सिंधिया के प्रदेश अध्यक्ष बनने की अटकलें लगने लगीं। लेकिन अब सिंधिया को महाराष्ट्र भेज दिया गया है।

 

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महाराष्ट्र में दिसंबर तक चुनाव प्रस्तावित हैं। अटकलें लगाई जा रही हैं कि मध्यप्रदेश में कांग्रेस जल्द ही अपने प्रदेश अध्यक्ष की घोषणा कर सकती है। ऐसे में सिंधिया महाराष्ट्र छोड़कर मध्यप्रदेश वापस नहीं आ सकते हैं। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यही कारण है कि सिंधिया एक बार फिर से मध्यप्रदेश की सियासत से दूर हो गए हैं।

 

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कमलनाथ-दिग्विजय, सिंधिया पर हावी
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया का कद प्रदेश की राजनीति में बढ़ा है। ज्योतिरादित्य सिंधिया मध्यप्रदेश कांग्रेस के बड़े नेता हैं लेकिन इसके बाद भी सिंधिया को प्रदेश में पार्टी की तरफ से कोई बड़ी जिम्मेदारी नहीं दी जा रही है। जानकारों का कहना है कि राहुल गांधी जब तक कांग्रेस अध्यक्ष थे ज्योतिरादित्य सिंधिया का कद बढ़ा था। राहुल गांधी के अध्यक्ष रहते हुए दिग्विजय सिंह का कद प्रदेश की सियासत में घटने लगा था वो खुद भोपाल से अपना चुनाव हार गए थे।

मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में सिंधिया प्रचार समिति के अध्यक्ष थे। लोकसभा चुनाव में उन्हें यूपी की जिम्मेदारी दी गई और पार्टी का महासचिव भी बनाया गया था। लेकिन अब सोनिया गांधी के अंतरिम अध्यक्ष बनने के बाद से एक बार फिर से कमलनाथ और दिग्विजय सिंह का कद पार्टी में बढ़ गया है। जब सिंधिया को महाराष्ट्र भेजे जाने का फैसला किया गया उस समय मुख्यमंत्री कमल नाथ दिल्ली में ही मौजूद थे। सूत्रों का कहना है कि ज्योतिरादित्य के महाराष्ट्र जाने से कमलनाथ खेमे के नेता को प्रदेश अध्यक्ष की कमान सौंपी जा सकती है। कमलनाथ के करीबी बाला बच्चन का नाम रेस में सबसे आगे बताया जा रहा है।

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सिंधिया के बाहर जाने से किसे होगा फायदा?
दिग्विजय सिंह और कमलनाथ के बाद प्रदेश के कांग्रेस नेताओं में ज्योतिरादित्य सिंधिया का नाम आता है। जानकारों का कहना है कि सिंधिया अगर मध्यप्रदेश की सियासत से दूर रहते हैं तो इसका सीधा फायदा कमलनाथ और दिग्विजय सिंह को हो सकता है। दिग्विजय सिंह इस समय राज्यसभा सांसद हैं और उनकी उम्र भी करीब 72 साल की है। दिग्विजय सिंह अब प्रदेश की सियासत में अपना वर्चश्व बचाए रखना चाहते हैं इसलिए अक्सर मीडिया के सामने आते रहते हैं। राज्यसभा सांद के अलावा उनके पास पार्टी का कोई बड़ा पद भी नहीं है। लेकिन दिग्विजय सिंह के बेटे जयवर्धन सिंह प्रदेश की सियासत में बड़ी तेजी से उभर रहे हैं। जयवर्धन सिंह अपनी पिता की सीट राघौगढ़ से दूसरी बार विधायक चुने गए हैं और प्रदेश सरकार में नगरीय प्रशासन मंत्री हैं।

 

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वहीं, दूसरी तरफ मध्यप्रदेश का सीएम बनने के बाद कमलनाथ इस बार लोकसभा का चुनाव नहीं लड़े। कमलनाथ 9 बार छिंदवाड़ा संसदीय सीट से सांसद रहे हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में कमलनाथ ने अपनी सीट अपने बेटे नकुलनाथ को सौंपी है। 2019 में उन्हें छिंदवाड़ा संसदीय सीट से टिकट मिला और वो मध्यप्रदेश में कांग्रेस के इकलौते सांसद हैं। जयवर्धन और नकुलनाथ दोनों ही युवा हैं और प्रदेश की सियासत में अपनी पहचान बनाने में लगे हुए हैं। अभी दोनों प्रदेश में दूसरी पंक्ति के नेताओं में शामिल हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया भी युवा हैं और केन्द्र की मनमोहन सरकार में दो बार मंत्री भी रह चुके हैं।

 

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अगर सिंधिया मध्यप्रदेश की सियासत में सक्रिय रहते हैं तो ज्योतिरादित्य सिंधिया के सामने जयवर्धन और नकुलनाथ सरीके नेता दूसरी पंक्ति के नेता ही बने रह जाएंगे और मौका सिंधिया को मिलेगा। अगर सिंधिया प्रदेश से बाहर सियासत करते हैं तो कमलनाथ और दिग्विजय के बाद जयवर्धन और नकुलनाथ प्रदेश में सियासत में आगे बढ़ सकते हैं।

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