
solar electricity प्रतिकात्मक फोटो (Photo Source- freepik)
Solar Power: एक तरफ केंद्र और राज्य सरकारें ग्रीन एनर्जी, खासकर रूफटॉप सोलर को बढ़ावा देने की बात कर रही हैं, वहीं मध्यप्रदेश में अपने घर की सोलर बिजली का उपयोग ही देश के सबसे महंगे मॉडल में बदलता दिख रहा है। मप्र विद्युत नियामक आयोग के नए टैरिफ आदेश के बाद अब ऐसे उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ बढ़ गया है, जो दिन में अपने सोलर प्लांट से अतिरिक्त बिजली ग्रिड में भेजते हैं और रात में जरूरत पड़ने पर वही बिजली वापस लेते हैं।
नई व्यवस्था के तहत 300 यूनिट सोलर बिजली ग्रिड में देकर बाद में उपयोग करने पर उपभोक्ता को 600 रुपए नियत प्रभार देना होगा। पहले यही राशि 560 रुपए थी। यानी सोलर अपनाने वाले उपभोक्ताओं को अब हर महीने ज्यादा फिक्स्ड चार्ज देना पड़ेगा। यह व्यवस्था खास तौर पर घरेलू उपभोक्ताओं को प्रभावित करेगी, क्योंकि अधिकांश घरों में बैटरी स्टोरेज की सुविधा नहीं होती और दिन में अतिरिक्त बिजली को ग्रिड में भेजना उनकी मजबूरी होती है। यदि पैदा की गई बिजली ग्रिड में न देकर सीधे उपयोग कर ली जाती है तब इन हालातों में उपभोक्ता को कोई शुल्क नहीं देना पड़ता।
बीते साल सोलर ऊर्जा पर नियत प्रभार की दरें प्रति 15 यूनिट पर 28 रुपए थी। इस तरह जो उपभोक्ता महीने में 300 यूनिट बिजली ग्रिड में लेकर उसका उपयोग करता था तो उसे प्रति 15 यूनिट के हिसाब से 300 यूनिट के 560 रुपए नियत प्रभार देने होते थे। अब 600 रुपए देने होंगे।
मध्यप्रदेशः 300 यूनिट ग्रिड से वापस लेने पर 600 रुपए नियत प्रभार (पहले 560)
दिल्लीः 3 केवी तक कुल सब्सिडी 1.08 लाख रुपए (78,000 केंद्र + 30,000 राज्य टॉप-अप), नेट-मीटरिंग को बढ़ावा
राजस्थानः अतिरिक्त सोलर बिजली पर 3.26 रुपए प्रति यूनिट (नेट-मीटरिंग), 3.65 रुपए प्रति यूनिट (नेट-बिलिंग)
महाराष्ट्रः अतिरिक्त सोलर बिजली पर करीब 2.82 प्रति यूनिट भुगतान ढांचा/प्रस्ताव, सालाना सेटलमेंट मॉडल
दरअसल, दिन के समय तेज धूप में सोलर पैनल घर की जरूरत से ज्यादा बिजली पैदा करते हैं। घरेलू उपभोक्ता उस अतिरिक्त बिजली को स्टोर नहीं कर पाते, इसलिए वह बिजली ग्रिड में चली जाती है। शाम और रात में जब सोलर उत्पादन बंद हो जाता है, तब वही उपभोक्ता डिस्कॉम से बिजली लेते हैं। उपभोक्ता सोलर बिजली पैदा कर ग्रिड में दे रहे हैं। इसके लिए उपभोक्ताओं को हर महीने आने वाले बिल में जमा बिजली के प्रति यूनिट 2.15 रुपए के हिसाब से क्रेडिट होकर आते हैं। मतलब बिलिंग यूनिट से लगभग आधी राशि ही दी जाती है।
ऊर्जा मामलों के जानकार राजेंद्र अग्रवाल का कहना है कि कंपनी सोलर बिजली पैदा करने और उसे ग्रिड में देने वाले उपभोक्ताओं का हिसाब-किताब साल में सिर्फ एक बार सितंबर में ही देखती है। अक्टूबर महीने के बिल में कंपनियों की ओर जमा बिजली की राशि क्रेडिट होकर आती है। उक्त राशि का समायोजन आने वाले बिलों में होता है, नगद राशि नहीं मिलती, जो कि मिलनी चाहिए। अग्रवाल ने कहा कि इसके लिए अगस्त 2025 से लेकर अब तक प्रधानमंत्री को दो बार पत्र लिख चुका हूं।
Published on:
01 Apr 2026 04:46 pm
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