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ताजमहल का वो दरवाजा जिसे खोलने से सरकार भी डरती है, पहली बार यहां देखें

ताजमहल भारत की शान है जिसे देखने दुनियाभर से सैलानी यहां पर आते हैं। इसके कई बड़े राज भी हैं।

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story of tajmahal

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भोपाल। प्यार की निशानी के रूप में प्रसिद्ध ताजमहल का निर्माण मुगल शासक शाहजहां ने अपनी बेगम मुमताज की याद में करवाया था। यहीं प्यार की निशानी ताजमहल भारत की शान है जिसे देखने दुनियाभर से सैलानी यहां पर आते हैं। कहानियों के अनुसार शाहजहां एक ऐसी इमारत बनाना चाहते थे जिसमें कोई गलती न हो लेकिन मुमताज महल की मजार के ठीक ऊपर छत पर एक छेद है। कहा जाता है कि शाहजहां द्वारा मजदूरों के हाथ काटने की बात सुन एक कारीगर ने जानबूझकर यह छेद किया ताकि ताज दोषहीन न रह सके। इसी तरह ताज की दीवारों पर बने 11 नक्काशीदार पिल्लरों में से एक का आकार गोल है जबकि अन्य में तिकोनी कटिंग का डिजाइन है। ताजमहल का एक और राज ये भी है कि ताजमहल के नीचे के कुछ कमरों को ईटों से ही बंद करवाया गया है।

शोधकर्ताओं का मानना है कि इन ईटों को ताजमहल के निर्माण के पश्चात बनाया गया अर्थात इन कमरों को बनाने के पश्चात इन्हें ईटों से ढक दिया गया और ये ताजमहल भोपाल में ही स्थित है। जी हां भोपाल शहर में भी एक ऐसा ताजमहल है जिसके कई किस्से हैं। आज हम आपको बताने जा रहे हैं ताजमहल के एक ऐेसे दरवाजे के बारे में जिसको आज तक कोई भी नहीं खोल पाया है। इतना ही नहीं इस दरवाजे को खोलने से सरकार भी डरती है।

वास्तु कला का अद्भुत नमूना है ये ताजमहल

भोपाल का ये ताजमहल वास्तु कला का अद्भुत नमूना है। इस ताजमहल में न ही कोई मकबरा है और न ही ये किसी के प्यार की निशनी है। इस ताजमहल को किसी शहंशाह ने नहीं बल्कि एक बेगम ने बनवाया था। इनका नाम शाहजहां बेगम था। ये रियासत की बेगम रही हैं और उन्होंने खुद के रहने के लिए इस ताजमहल का निर्माण कराया था। बता दें कि इस ताजमहल में आठ बड़े हॉल के साथ सैकड़ों कमरें बनवाएं गए हैं। कहा जाता है कि शाहजहां बेगम की सारें बैठकें और बड़ी-बड़ी दावतें इस हॉल में हुआ करती थीं। इसका निर्माण साल 1871 में शुरू हुआ था और साल 1884 में ये पूरी तरह से बनकर तैयार हो गया था। पूरे 13 सालों में तैयार हुआ ये ताजमहल आज भी बिल्कुल नया सा लगता है।

ये ताजमहल पहले था 'राजमहल'

कहा जाता है कि बेगम ने इस ताजमहल का नाम 'राजमहल' रखा था लेकिन इसकी खूबसूरती इतनी ज्यादा थी कि बाद में इसका नाम ताजमहल कर दिया। सत्रह एकड़ में बने इस ताजमहल को बनाने में तीन लाख रुपए का खर्च आया था। महल बनने के बद बेगम इतनी खुश हुईं थी कि उन्होंने तीन साल तक जश्न बनाया था। इस ताजमहल में बाहर से पांच मंजिल और अंदर दो मंजिल है।

हाथी भी नहीं तोड़ सकते हैं इसके दरवाजे

कहा जाता है कि इस ताजमहल की खूबी इसके दरवाजे है। ये दरवाजे एक टन से ज्यादा वजन के हैं। कई सारे हाथी मिलकर भी इन दरवाजों को तोड़ना चाहें तो वे इसको नहीं तोड़ सकते हैं। इन दरवाजों का साइज भी इतना बड़ा है कि 16 घोड़ों वाली बग्गी भी 360 डिग्री में घूम सकती थी। इन दरवाजों को बनाने में की नक्काशी में रंगीन कांच का प्रयोग किया गया था। रंगीन कांचमें जब सूरज की किरणें पड़ती हैं तो रोशनी से उत्पन्न होने वाली चमक लोगों की आंखों पर पड़ती थी। इन दरवाजों से आंदर व बाहर जाने के लिए आपको अपने सिर को झुकाना पड़ेगा।

ताजमहल में अग्रेंज भी नहीं घुस पाए

एक बार एक अंग्रेज अफसर जब इस ताजमहल को देखने के लिए इसके अंदर गए तो उन्हें इसके दरवाजों से होकर गुजरना था। इस ताजमहल के दरवाजों से प्रवेश करने के लिए झुकना पड़ता है लेकिन अंग्रेज अफसर को ये बात मंजूर नहीं थी। अंग्रेज अफसर ने बेगम से इस दरवाजों के ऊपर बने कांच को तोड़ने के निर्देश दिए लेकिन बेगम ने इस बात से साफ इंकार कर दिया है। कहा जाता है कि रानी के इंकार करने के बाद अंग्रेज अफसर का पारा चढ़ गया और उसे लगातार 100 फायर कर दिए लेकिन तब भी वो इस दरवाजे को नहीं तोड़ पाए।