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इमली की छांव से IPL तक: जानिए एमपी के 10 अनोखे शिक्षकों ने कैसे बदली शिक्षा की तस्वीर

Teachers Day Special MP: पत्रिका में पढ़िए ऐसे 10 शिक्षकों की कहानी, जिन्होंने अपनी पर्वाह न करते हुए बच्चों के भविष्य के लिए जिम्मेदारी निभाई...। पढ़िए 10 शिक्षकों की प्रेरक कहानियां...।
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भोपाल

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Manish Gite

Sep 05, 2026

Teachers Day Special MP

Teachers Day Special MP- कई शिक्षकों ने अपने आपको बच्चों के भविष्य के लिए समर्पित कर दिया। (विजुअल एआई जनरेटेड)

Teachers Day Special MP: दलदल, जंगल की पगडंडियां, पहाड़ों की चढ़ाई, उफनते नाले और बांध की लहरें… कहीं दिव्यांग शिक्षक पैदल चलकर स्कूल पहुंच रहे हैं तो कहीं शिक्षिका अपनी आठ माह की बेटी को साथ लेकर दुर्गम सफर कर रही हैं। शिक्षक दिवस पर मध्यप्रदेश के ऐसे शिक्षकों की प्रेरक कहानियां, जिन्होंने सुविधाओं और मुश्किल परिस्थितियों की परवाह किए बिना बच्चों की पढ़ाई को अपनी पहली जिम्मेदारी बनाया और समर्पण की मिसाल पेश की।

शहडोलः दो किमी तक दलदल, रोज पाठशाला

शहडोल. सिंहपुर संकुल के प्राथमिक स्कूल आधार टोला में पदस्थ शिक्षक उपेन्द्र तिवारी के लिए बारिश के चार महीने बड़ी चुनौती भरे होते हैं। बोडरी से स्कूल की चार किमी दूरी में दो किमी रास्ता दलदल बन जाता है। बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो, इसलिए वे रोज एक घंटा पहले घर से निकलते हैं। एक किसान के घर बाइक खड़ी कर दलदली रास्ता पैदल पार करते हैं। रास्ते में गांव के बच्चों को एकत्र कर उन्हें सुरक्षित अपने साथ स्कूल ले जाते हैं और छुट्टी के बाद वापस भी पहुंचाते हैं।

मंडला: सात किमी जंगल, रोज पैदल सफर

मंडला. घुघरी विकासखंड के प्राथमिक शाला खौड़ाखुदरा में अतिथि शिक्षक समारू मसराम का रोज का सफर संघर्ष से भरा है। स्कूल तक पक्की सड़क नहीं है। इसके बावजूद वे खेतों और जंगलों के बीच से गुजरते हुए, नालों को पार कर रोज करीब सात किमी पैदल चलते हैं। उनका यह सफर उन बच्चों के भविष्य तक पहुंचने का है, जिनकी पढ़ाई दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के कारण प्रभावित हो सकती है।

भिंड: दिव्यांग गुरु, तीन किमी पैदल

भिण्ड. शासकीय प्राथमिक विद्यालय कछपुरा मीसा में पदस्थ दिव्यांग शिक्षक सुरेश कुमार बघेल का जज्बा प्रेरक है। वे गांव किसन की गढिय़ा से पांच किमी दूर स्कूल तक साइकिल से पहुंचते हैं। मुख्य मार्ग से स्कूल तक तीन किमी कच्चा रास्ता है, जो बारिश में साइकिल चलाने लायक नहीं रहता। वे पैदल ही स्कूल पहुंचते हैं। सुरेश 26 बच्चों को पढ़ा रहे हैं। लंबे समय से सड़क निर्माण की मांग हो रही है।

खंडवा: 6 किमी पगडंडी, किराए का स्कूल

खंडवा. खालवा क्षेत्र के बंदी रैयत प्राथमिक स्कूल तक पहुंचना किसी चुनौती से कम नहीं है। जंगल के बीच छह किमी की पगडंडी, पहाड़ी चढ़ाई और उतराई पार कर शिक्षक ऊषा काजले और रामप्रसाद सिलाने बच्चों तक पहुंचते हैं। बारिश में रास्ता कीचड़ व फिसलन से भर जाता है। स्कूल भवन ढहने के बाद कक्षाएं किराए के भवन में लग रही हैं।

महू: बेटी साथ, सात नाले पार

डॉ आंबेडकर नगर (महू). प्राथमिक शिक्षिका पूजा प्रजापत के लिए स्कूल पहुंचना रोज एक कठिन परीक्षा जैसा है। वर्ष 2019 से छोटी उमठ प्राथमिक शाला में पदस्थ पूजा को स्कूल पहुंचने के लिए जंगल और पहाड़ी क्षेत्र से करीब 10 किमी सफर करना पड़ता है। रास्ते में सात नदी-नाले और दो बड़े पुल आते हैं। अब वे अपनी आठ माह की बेटी को भी साथ लेकर स्कूल जाती हैं। मोबाइल नेटवर्क जैसी सुविधा भी नहीं है।

नरसिंहपुर: घर से दूर, बच्चों के करीब

नरसिंहपुर. घने जंगल, ऊंची पहाड़ी और 12 किमी का दुर्गम रास्ता बड़ागांव स्कूल तक पहुंचने में बड़ी बाधा है। लेकिन 155 बच्चों की पढ़ाई न रुके, इसके लिए यहां पदस्थ शिक्षकों ने घर-परिवार से दूर गांव में ही अपना ठिकाना बना लिया है। झोपड़ीनुमा मकान में रहकर शिक्षक नियमित नर्सरी से दसवीं तक की कक्षाएं संचालित कर रहे हैं। स्कूल में दो नियमित, छह अतिथि, एक लैब शिक्षक पदस्थ हैं।

राजगढ़: नवाचार से बदली स्कूल की तस्वीर

राजगढ़. प्राथमिक स्कूल को संसाधनों, स्वच्छता और शिक्षा का मॉडल बनाने वाले शिक्षक सुरेशचंद्र सोनी को राज्यपाल राज्य स्तरीय सम्मान देंगे। माचलपुर-2 के स्कूल में उन्होंने जनभागीदारी से शैक्षणिक सामग्री और संसाधन जुटाए। सोनी ने स्कूल की सफाई और सुंदरता के साथ अपने खर्च पर बागवानी विकसित की। स्कूल को स्वच्छ बनाने के साथ वे नगर के स्वच्छता ब्रांड एंबेसडर की भूमिका भी निभा रहे हैं।

गुना: सरकारी स्कूल में प्राइवेट जैसी सुविधा

गुना. निजी स्कूलों जैसी सुविधाओं का सपना दिखाने के बजाय शिक्षक नरेंद्र भारद्वाज ने बालक माध्यमिक विद्यालय में उन्होंने पढ़ाई को रोचक बनाने के साथ स्कूल की व्यवस्थाएं भी बेहतर कीं। वहीं शिक्षक मुकेश शर्मा ने गेहूंखेड़ी हाईस्कूल की तस्वीर बदलने बड़ी भूमिका निभाई है। वह हर साल छात्र-छात्राओं का अपनी ओर से गणवेश देते हैं।

इमली की छांव में शुरू हुई पाठशाला

भोपाल. किसी स्कूल की पहचान सिर्फ उसके भवन से नहीं होती, बल्कि वहां पढऩे वाले बच्चों की आंखों में दिखने वाले सपनों से होती है। शा. प्राथमिक शाला सेमरी खुर्द के शिक्षक राकेश पटेल की कहानी इसी सोच की मिसाल है। 1997 में जब स्कूल की जिम्मेदारी संभाली, तब न पर्याप्त सुविधाएं थीं और न ही पक्का भवन। इमली के एक पेड़ की छांव में करीब 15 बच्चों के साथ कक्षाएं लगती थीं। आज स्कूल में 300 बच्चे पढ़ते हैं। राकेश पटेल ने सुविधाओं की कमी को बच्चों की पढ़ाई में बाधा नहीं बनने दिया। पहले वे खुद बच्चे को गाड़ी से स्कूल लाया करते थे। फिर स्कूल से 5 किलोमीटर दूर रहने वाले बच्चों को भी शिक्षा से जोड़ने के लिए ई-रिक्शा की व्यवस्था शुरू की। शिक्षक पटेल ने बताया कि मिशन में अभिभावकों, संस्थाओं और सहयोगियों की मदद ली। इमली के पेड़ से शुरू यह सफर आज बच्चों के बेहतर भविष्य की नींव बन चुका है।

आइपीएल के स्कोर से समझ आया गणित, तो बच्चों का डर भी छूटा

भोपाल. गणित की कक्षा में जब आइपीएल के स्कोर, फुटबॉल विश्व कप के आंकड़े और सोशल मीडिया के रुझान चर्चा का विषय बनने लगे तो विद्यार्थियों को लगा कि आज पढ़ाई कुछ अलग है, लेकिन इसी बातचीत के बीच वे प्रतिशत, प्रायिकता, सांख्यिकी और आंकड़ों का विश्लेषण सीख रहे थे। डॉ. संगीता यादव ने गणित को किताब के पन्नों से निकालकर बच्चों की ङ्क्षजदगी से जोड़ दिया। उन्होंने जल्दी समझ लिया था कि बच्चों की परेशानी गणित में नहीं, बल्कि उसे समझाने के तरीके में है। इसलिए उनकी कक्षा में खेल, चुनाव, अर्थव्यवस्था, तकनीक और रोजमर्रा की घटनाएं गणित सीखने के उदाहरण बन गईं। डॉ. संगीता ने बताया कि अब विद्यार्थी केवल उत्तर याद करने के बजाय आंकड़ों को देखते, सवाल करते, तुलना करते और खुद निष्कर्ष निकालते हैं। उनकी कोशिश है कि पढ़ाई रटने से खोज, डर से जिज्ञासा और निष्क्रिय सीखने से समस्या समाधान की ओर बढ़े।