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फागुन की फुहार: तुलसी साहित्य अकादमी की गोष्ठी में गूंजी फाग और लोक संस्कृति की तान

bhopal news: तुलसी साहित्य अकादमी की ओर से सृजन श्रृंखला-55 के तहत होली को लेकर काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया।

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bhopal news: मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में साहित्यिक संस्था तुलसी साहित्य अकादमी की ओर से सृजन श्रृंखला-55 के तहत होली को लेकर काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण 'फाग साहित्य' पर केंद्रित रचनाओं का सस्वर पाठ रहा, जिसमें कवियों ने अपनी लेखनी से फागुन के रंगों को जीवंत कर दिया।

सांस्कृतिक शुभांरभ और लुप्त होती परंपराएं

कार्यक्रम की अध्यक्षता अकादमी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. मोहन तिवारी आनंद ने की। मुख्य अतिथियों ने मां सरस्वती के पूजन और दीप प्रज्ज्वलन के साथ समारोह का आगाज हुआ। डॉ. राजेश तिवारी ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की। सारस्वत अतिथि के रूप में उपस्थित डॉ. सुरेश पटवा ने लोक संस्कृति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि वर्तमान दौर में लोकगीत, गारी और फाग जैसी विधाएं लुप्त होती जा रही हैं। उन्होंने बताया कि इन रचनाओं में छंद का कड़ा अनुशासन भले न हो, लेकिन लय और तुकबंदी का अनूठा संगम होता है। उन्होंने अपनी रचना मैं अलवेली फागुन महीना, मैं अकेली गुदा आई गुदना सुनाकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।

काव्य पाठ में बिखरे फागुन के रंग

गोष्ठी में ‘पहले आओ, पहले पाओ’ की तर्ज पर कुल 29 रचनाकारों ने अपनी काव्य प्रस्तुति दी। मुख्य अतिथि दीपक पंडित ने होली रंगों का त्योहार प्यार भरा उपहार और विशिष्ट अतिथि अशोक निर्मल ने यूँ अकेले लेकर निकलो हिरणी सा दिल फागुन में सुनाकर खूब तालियां बटोरीं।

रचनाकारों ने बिखेरे संस्कृति के रंग

कमलेश नूर ने होली के आध्यात्मिक पक्ष रखे। गोकुल सोनी और डॉ. राजेश तिवारी ने ससुराल और सालियों के संग होली के ठिठोली भरे छंद पढ़े। दतिया से आए जगत शर्मा ने रंगों में डूबे छंद और ख्याल पेश किए। कर्नल गिरिजेश सक्सेना और गोपाल नीरज ने गंभीर विषयों को छुआ, वहीं मलिक सिंह मलिक और रेणु श्रीवास्तव ने गुलाल और खुशबू के अहसास को शब्दों में पिरोया। अंत में संस्था के अध्यक्ष डॉ. मोहन तिवारी आनंद ने सभी रचनाकारों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसे आयोजनों से न केवल साहित्य समृद्ध होता है, बल्कि हमारी लोक परंपराएं भी सुरक्षित रहती हैं। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमी और प्रबुद्धजन उपस्थित रहे।