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Akshat - वे पूरी तरह दृष्टिबाधित हैं। प्रारंभिक शिक्षा सरकारी स्कूल में हिंदी मीडियम से की। कॉलेज के शुरुआती सालों में उन्हें संघर्ष करना पड़ा और अंक भी उम्मीद के मुताबिक नहीं आए पर हार नहीं मानी। आखिरकार सपने पूरे भी हुए। इंदौर के अक्षत बलद्वा akshat ने यूपीएससी में ऑल इंडिया रैंक 173 हासिल की है। उन्होंने अपने पहले ही प्रयास में यह उपलब्धि पाई। हालांकि सफलता की राह में उदासी के भी कई पल आए। अक्षत खुद को बेहद थका हुआ और निराश महसूस करने लगे थे। लेकिन उनकी मेहनत और लगन रंग लाई।
अक्षत बलद्वा मूल रूप से इंदौर के ही रहने वाले हैं। उनकी शुरुआती पढ़ाई हिंदी माध्यम से सरकारी स्कूल में हुई। 11वीं और 12वीं तक उन्होंने हिंदी माध्यम से ही पढ़ाई की, लेकिन मन में शुरू से ही सिविल सेवा में जाने का सपना था।
स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद अक्षत ने कॉमन लॉ एडमिशन टेस्ट (क्लैट) दिया और नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी में एलएलबी की पढ़ाई की। हालांकि हिंदी माध्यम से पढ़कर अचानक पूरी तरह अंग्रेजी माहौल में पढ़ना उनके लिए आसान नहीं था। कॉलेज के शुरुआती सालों में अक्षत को संघर्ष करना पड़ा और अंक भी उम्मीद के मुताबिक नहीं आए। पर उन्होंने हार नहीं मानी और धीरे-धीरे खुद को उस माहौल के अनुसार ढाल लिया।
अक्षत ने यूपीएससी की तैयारी कॉलेज के पांचवें वर्ष में शुरू की। उस समय एक तरफ प्रतिष्ठित लॉ कॉलेज का कठिन अकादमिक दबाव था और दूसरी तरफ सिविल सेवा की तैयारी। दोनों को साथ संभालना आसान नहीं था, लेकिन मेहनत जारी रखी। वर्ष 2025 में उन्होंने ग्रेजुएशन पूरा किया और उसी साल यूपीएससी की परीक्षा भी दी। इस पहले ही प्रयास में उन्होंने 173वीं रैंक हासिल कर ली।
सफलता के पहले ऐसे अनेक पल भी आए जब अक्षत खुद को बेहद थका हुआ और निराश महसूस करते थे। उन्होंने बताया कि परिणाम आने से तीन दिन पहले तक निराश थे और लगने लगा था कि मानसिक रूप से यह यात्रा बहुत कठिन है। ऐसे कठिन समय में भी अक्षत ने खुद को संभाला। उनका कहना है कि मुश्किल समय में किसी और से ज्यादा खुद से ही बातें की और खुद को समझाया कि जिंदगी में हर किसी की अपनी-अपनी चुनौतियां हैं।
अक्षत का मानना है कि तैयारी के दौरान आत्मविश्वास और आत्मप्रेरणा सबसे ज्यादा जरूरी है। कोई भी व्यक्ति बाहर से आपको कितनी भी सलाह दें, लेकिन असली ताकत तब आती है जब आप खुद अपने भीतर से खड़े होते हैं। परिवार का भी उन्हें पूरा सहयोग मिला। उनकी मां उनके साथ रहती थीं और लगातार उनका हौसला बढ़ाती रहीं।
Published on:
06 Mar 2026 06:55 pm
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