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World Sparrow Day: 3 साल में 30% बढ़ी गोरैया की संख्या, घरों में जरूर बनाएं 1 ‘गोरैया हाउस’

-आवास नष्ट होने से घटती जा रही थी संख्या-पिछले तीन साल में शहर में बंटे 10 हजार से अधिक घोंसले

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World Sparrow Day

भोपाल। शहरवासियों की पहल से एक बार फिर से आंगन में नन्हीं गोरैया की चहचहाहट सुनाई देने लगी है। राजधानी में पिछले 3 सालों में गौरैया की संख्या में करीब 30 फीसदी इजाफा हुआ है। कुछ सालों पहले इंसानों की पर्यावारण के साथ बढ़ती छोड़छाड़ी के कारण ये शहर से गायब सी हो गई थी। लेकिन अब अलग-अलग संस्थाओं और पर्यावरण प्रेमियों की ओर से लगातार अभियान चलाए जा रहे हैं। भोपाल बर्ड्स ने पूरे शहर में गोरैया के सरंक्षण के लिए पिछले तीन साल में करीब 10 हजार से अधिक कृत्रिम घोंसले बांटे हैं। वहीं वन विभाग और अन्य संस्थाओं ने मिलकर भी कई घोसलें बांटे हैं। घरों में ये नेस्ट आने से गोरैया लौटने लगी हैं।

पुराने शहर में सबसे कम गौरैया

राजधानी से सटे आस-पास के इलाकों में गोरैया की संख्या सबसे अधिक है। जबकि शहर के भीतर इनकी संख्या कम हो रही है। एमपीनगर, पुराने शहर जैसे भीड़-भाड वाले इलाके इसमें शामिल है। जबकि बिशनखेड़ी, बड़े तालाब और अन्य झीलों के किनारे भी बड़ी संख्या में गौरेया देखी जा सकती है।

कम होने के यह कारण

भोपाल बर्ड्स की संगीता राजगीर ने बताया कि गोरेया कम होने के पीछे कई कारण हैं। गौरेया के रहने के लिए आवास कम हो रहे हैं। कच्ची मिट्टी की जगह अब सीमेंट ने ले ली है। ग्रीनरी कम हो रही है। पहले खुले-मकान होते थे। घरों के आस-पास कच्ची मिट्टी आसानी से मिल जाती थी। लेकिन अब बिल्डिंग और फ्लेट सिस्टम आ गए हैं। इनके लिए पाम ट्री लगाने का ट्रेंड बढ़ा है।

इकोनॉमी और इकोसिस्टम में अहम रोल

गौरेया का इको-सिस्टम और इकोनॉमी में बड़ा रोल है। गौरेया के बच्चे कीड़े मकोड़े खाते हैं। इससे पर्यावरण में उनकी पॉपुलेशन कम होती है। इससे खेतों में फसलों के खराब होने का खतरा भी कम हो जाता है। इसलिए इनके सरंक्षण के लिए काम करना बेहद जरूरी है। घरों के आस-पास कच्ची जगह रख सकते हैं। साथ ही देसी प्रजाति के पेड-पौधे लगाने से गौरैया आसानी से अपना घर बनाती है।

संरक्षण नहीं हुआ तो हो जाएगी गायब

हमारे आंगन में आसानी से दिख जाने वाली नन्ही सी गोरैया की संख्या आज तेजी से कम हो रही है। इसके शरीर पर छोटे-छोटे पंख, पीली चोंच व पैरों का रंग पीला होता है। नर गोरैया का पहचान उसके गले के पास काले धब्बे से होती है। गोरैया मनुष्य के साथ ही उनके घरों में घोंसले बनाकर तब से रह रही है, जब से मनुष्य ने पहली बार खेती करना शुरू किया था। गोरैया से जुड़ी कथा-कहानियां हम बचपन से सुनते आ रहे हैं। इस नन्हें पंछी की नब्बे के दशक के बाद से तेजी से इसकी संख्या में कमी आई है।

अपनाएं ये उपाय

घरों में गोरैया के घोंसले के लिए जगह रखें। लकड़ी-कागज के डिब्बे से स्पैरो हाउस बना सकते हैं। स्पैरो हाउस को शांत जगह लगाएं। स्पैरो हाउस में चटक रंग का उपयोग ना करें। किसी भी तरह के किसी तेल-गंध का इस्तेमाल भी ना करें। लकड़ी के स्पैरो हाउस बनाते समय उसमें नीचे गड्ढे जरूर बनाएं, ताकि पानी इकट्ठा ना हो। -डॉ.अर्चना शुक्ला, भोपाल (मध्यप्रदेश)

2022 के अनुसार शहर के अलग-अलग इलाकों में गौरैया की गणना

एमपी नगर: 100 से कम
कमला नगर: 200-300
इब्राहिमपुरा: 200-300
शिवाजी नगर: 400-500
लालघाटी: 600-700
अरेरा कॉलोनी: 1000-1100
शाहपुरा: 1000-1100
श्यामला हिल्स: 1200-1300