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Bikaner: भेड़ पालकों के लिए बड़ी खबर: अब 1.30 घंटे में होगी मल्टीपेरस-यूनिपेरस पहचान, नई तकनीक को पेटेंट

Veterinary Research Rajasthan: वर्तमान में मल्टीपेरस और यूनिपेरस भेड़ों की पहचान करने में अभी तक करीब 12 घंटे का समय लग जाता है। अब इसकी पहचान महज डेढ़ घंटे में हो सकेगी। राजस्थान पशु चिकित्सा और पशु विज्ञान विश्वविद्यालय (राजुवास) के वैज्ञानिकों ने यह नई तकनीक इजाद की है।

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राजस्थान पशु चिकित्सा और पशु विज्ञान विश्वविद्यालय, पत्रिका फोटो

राजस्थान पशु चिकित्सा और पशु विज्ञान विश्वविद्यालय, पत्रिका फोटो

Veterinary Research Rajasthan: वर्तमान में मल्टीपेरस और यूनिपेरस भेड़ों की पहचान करने में अभी तक करीब 12 घंटे का समय लग जाता है। अब इसकी पहचान महज डेढ़ घंटे में हो सकेगी। राजस्थान पशु चिकित्सा और पशु विज्ञान विश्वविद्यालय (राजुवास) के वैज्ञानिकों ने यह नई तकनीक इजाद की है। इससे पहचान में लगने वाले समय की बचत होगी। इस तकनीक को राजुवास ने पेटेंट भी करवा लिया है। इससे भेड़ पालकों को फायदा मिलेगा।

तकनीक में ये खास

वेटरनरी विश्वविद्यालय के कुलगुरु डॉ. सुमंत व्यास ने बताया कि नई तकनीक भेड़ों में मौजूद बूरूला फीकंडिटी जीन में होने वाले विशेष पॉइंट म्यूटेशन की तेज और सरल पहचान करने में सक्षम है। पारंपरिक विधियों में इसकी पहचान में 12 घंटे से अधिक समय लगता है।
पूरी प्रक्रिया भी कई चरणों में होती है। इससे लागत भी ज्यादा आती है। नई विकसित तकनीक सिंगल-स्टेप विधि है। इसे प्रयोगशाला के जटिल उपकरणों के बिना भी किया जा सकता है। इससे जांच लागत भी कम आती है।

इनकी रही खास भूमिका

इस शोध कार्य में डॉ. सुनील मेंहरचंदानी, डॉ. कृतिका गहलोत, डॉ. मयंक कुमार अग्रवाल, डॉ. रमेश चंद्र शर्मा, डॉ. अमित कुमार पांडे, डॉ. नरेंद्र सिंह राठौड़ तथा डॉ. बृज नंदन श्रृंगी ने प्रमुख भूमिका निभाई। शोधकर्ताओं ने बताया कि यह खोज न केवल पशुपालन क्षेत्र में तकनीकी प्रगति का उदाहरण है बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती प्रदान करेगी।

भेड़ पालकों को होगा लाभ

मल्टीपेरस और यूनिपेरस भेड़ों की पहचान की नई तकनीक विकसित होने पर अब भेड़ पालकों को आर्थिक लाभ होगा। भेड़ों उन्नत नस्ल से ज्यादा मात्रा में बाल मिलने से किसानों को फायदा होगा। कम उन्नत नस्ल की पहचान के बाद किसान अन्य भेड़ों का उपयोग करने की कारगर योजना बना सकेंगे। फिलहाल तकनीक नहीं होने से कम बालों वाली भेड़ों को पालना किसानो के लिए मजबूरी बन गई है।

आसानी से कर सकेंगे उपयोग

डॉ. सुनील मेंहरचंदानी की प्रेरणा से इस पर शोध कार्य शुरू किया गया था। इस तकनीक का उपयोग घर या पशु फार्म पर भी किया जा सकता है। केवल गर्म पानी से भरे एक साधारण पात्र की सहायता से परीक्षण हो सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों और पशुपालकों के लिए यह विधि उपयोगी सिद्ध होगी। इस भेड़ पालन की उत्पादकता बढ़ाने, बेहतर नस्ल चयन करने और पशुपालकों की आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान मिलेगा।

-डॉ. अमित कुमार पांडे, सहायक आचार्य