
LB Teachers Case: सात शिक्षकों ने दायर की थी याचिका(photo-patrika)
High Court MTP Verdict: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अहम और संवेदनशील मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए दुष्कर्म के बाद गर्भवती हुई 21 वर्षीय युवती को गर्भपात (MTP) की अनुमति दे दी है। जस्टिस एनके व्यास की एकल पीठ ने कहा कि रेप पीड़िता को यह पूरा अधिकार है कि वह अपनी गर्भावस्था को जारी रखना चाहती है या नहीं। कोर्ट ने पीड़िता की स्थिति को देखते हुए उसे सिम्स या जिला अस्पताल बिलासपुर में भर्ती कराने के निर्देश भी दिए हैं। साथ ही भ्रूण का DNA सैंपल सुरक्षित रखने का आदेश दिया गया है।
यह मामला बिलासपुर के सिविल लाइन थाना क्षेत्र का है, जहां एक 21 वर्षीय युवती ने अपने प्रेमी पर दुष्कर्म का आरोप लगाते हुए केस दर्ज कराया था। पुलिस ने आरोपी के खिलाफ मामला दर्ज कर उसे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है। आरोप है कि आरोपी ने युवती के साथ जबरदस्ती संबंध बनाए और शादी का वादा भी किया, लेकिन बाद में शादी करने से इनकार कर दिया। दुष्कर्म की घटना के बाद युवती गर्भवती हो गई, जिससे उसकी मानसिक और शारीरिक स्थिति पर गंभीर प्रभाव पड़ा।
गर्भावस्था के कारण मानसिक तनाव और सामाजिक दबाव झेल रही पीड़िता ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर गर्भपात की अनुमति मांगी थी। याचिका में कहा गया कि वह इस गर्भ को जारी नहीं रखना चाहती, क्योंकि यह उसके लिए मानसिक कष्ट और सामाजिक शर्मिंदगी का कारण बन रहा है।
कोर्ट ने प्रारंभिक सुनवाई के दौरान मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO), बिलासपुर को मेडिकल बोर्ड गठित कर जांच करने के निर्देश दिए थे। मेडिकल रिपोर्ट में पाया गया कि युवती लगभग 16 से 20 सप्ताह की गर्भवती है।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि किसी भी रेप पीड़िता को अपनी प्रेग्नेंसी को लेकर निर्णय लेने का पूर्ण अधिकार है। कोर्ट ने माना कि इस स्थिति में बिना न्यायिक अनुमति के डॉक्टर गर्भपात नहीं कर सकते थे, इसलिए याचिका स्वीकार की जाती है। कोर्ट ने आदेश दिया कि पीड़िता को तत्काल सिम्स या जिला अस्पताल, बिलासपुर में भर्ती कराया जाए, जहां विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम उसकी सहमति से मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) प्रक्रिया पूरी करेगी।
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि भ्रूण का DNA सैंपल सुरक्षित रखा जाए, ताकि आगे चलकर आपराधिक मामले की जांच और ट्रायल में इसका उपयोग किया जा सके। यह फैसला न केवल पीड़िता के अधिकारों को मजबूत करता है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि न्यायपालिका ऐसे संवेदनशील मामलों में पीड़िता की मानसिक, शारीरिक और सामाजिक स्थिति को प्राथमिकता देती है।
Updated on:
22 May 2026, 4:57 PM IST
Published on:
22 May 2026, 4:57 PM IST
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