समृद्ध शिक्षकों की समस्याओं वाली डेनमार्क की 'Another Round' से उठेगा गोवा समारोह का पर्दा

By: पवन राणा
| Published: 04 Jan 2021, 10:09 PM IST
समृद्ध शिक्षकों की समस्याओं वाली डेनमार्क की 'Another Round' से उठेगा गोवा समारोह का पर्दा
समृद्ध शिक्षकों की समस्याओं वाली डेनमार्क की 'Another Round' से उठेगा गोवा समारोह का पर्दा

  • भारत की 'जलीकट्टू' के साथ ऑस्कर की दौड़ में भी शामिल
  • शरीर में अल्कोहल पहुंचाकर 'एक्टिव' होने का प्रयोग
  • शिक्षक-छात्रों के रिश्तों पर भारत में भी बन चुकी हैं फिल्में

-दिनेश ठाकुर
गोवा में 16 जनवरी से शुरू होने वाले भारत के अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह की उद्घाटन फिल्म के तौर पर डेनमार्क की 'अनादर राउंड' ( Another Round Movie ) को चुना गया है। दूसरे यूरोपीय देशों की तरह डेनमार्क की फिल्में भी यथार्थवाद और नैतिकता पर जोर देती हैं। यौन संबंधों को लेकर इनमें उदारता का भाव रहता है। निर्देशक थॉमस विंटरबर्ग की 'अनादर राउंड' पिछले साल टोरंटो फिल्म समारोह में दिखाई जा चुकी है। इस साल यह सर्वश्रेष्ठ विदेशी फिल्म के ऑस्कर अवॉर्ड की दौड़ में शामिल है। इस अवॉर्ड के दावेदारों में भारत की 'जलीकट्टू' (मलयालम) भी है। भारतीय फिल्मों को अभी ऑस्कर अवॉर्ड में खाता खोलना है, जबकि डेनमार्क की तीन फिल्में 'बेबेट्स फीस्ट' (1987), 'पेले द कॉन्करर' (1988) और 'इन द बेटर वर्ल्ड़' (2011) ऑस्कर जीत चुकी हैं।

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विकसित देश की कॉमेडी फिल्म
कॉमेडी फिल्म 'अनादर राउंड' में स्कूल के चार शिक्षकों की कहानी है, जिन्हें लगता है कि वे अपने छात्रों को सही दिशा में प्रेरित नहीं कर पा रहे हैं। फिल्म शिक्षकों और छात्रों के रिश्तों के बहाने शिक्षकों की समस्याओं को हल्के-फुल्के अंदाज में पेश करती है। चूंकि डेनमार्क विकसित देश है, उसकी फिल्मों में समृद्ध समाज की ऐसी समस्याओं पर फोकस रहता है, जो आम भारतीयों की नजर में शायद समस्याएं ही न हों। 'अनादर राउंड' के चार शिक्षक अपने शरीर में अल्कोहल पहुंचाकर 'एक्टिव' होने का प्रयोग करते हैं। यह प्रयोग इनमें से कुछ के लिए तो मुफीद रहता है, लेकिन बाकी के लिए अच्छा-खासा सिरदर्द बन जाता है। भारत में इस तरह की कहानी पर फिल्म बने, तो हंगामा खड़ा हो जाए। हमारे यहां आज भी समाज में शिक्षकों के प्रति 'गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागू पांय' वाला आदर भाव कायम है।

ब्रिटिश 'टू सर विद लव' सदाबहार
शिक्षक-छात्रों के रिश्तों पर कई फिल्में बन चुकी हैं। इनमें ब्रिटिश फिल्म 'टू सर विद लव' (1967) क्लासिक का दर्जा रखती है। निर्देशक जेम्स क्लेवेल की इस फिल्म से प्रेरित होकर भारत में इस्माइल श्रॉफ 'बुलंदी' (1981) बना चुके हैं। इसमें राज कुमार प्रोफेसर के किरदार में थे। डैनी का डबल रोल था। 'बुलंदी' की कहानी में मामूली हेर-फेर कर महेश भट्ट ने नसीरुद्दीन शाह, पूजा भट्ट और अतुल अग्निहोत्री को लेकर 1993 में 'सर' बनाई। 'मोहब्बतें' (अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान), 'इकबाल' (नसीरूद्दीन शाह, श्रेयस तलपडे), 'तारे जमीन पर' (आमिर खान, दर्शील सफारी), 'स्टेनली का डब्बा' (अमोल गुप्ते, पर्थो गुप्ते) जैसी फिल्मों का ताना-बाना भी शिक्षक और छात्रों के रिश्तों के इर्द-गिर्द बुना गया।

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हिन्दी फिल्में फार्मूलों के फेर में
हॉलीवुड की 'हैप्पीनेस इज लविंग यूअर टीचर', 'ऑल थिंग्स फेयर', 'ब्लैकबोर्ड जंगल', 'डेड्रीम नेशन', 'द फोरेस्ट फॉर द ट्रीज', 'द प्यानो टीचर' और 'ब्लू कार' भी शिक्षक-छात्रों के भावनात्मक रिश्तों पर उल्लेखनीय फिल्में हैं। बॉलीवुड की फिल्मों में कभी एक तरफ 'इज्जत के संग जीना है तो मुन्ने पढऩा-लिखना सीख' का सबक दिया जाता था, तो दूसरी तरफ 'सकूल में क्या पढ़ोगे, दिल की किताब पढ़ लो' के स्वर भी बुलंद हुए। ज्यादातर हिन्दी फिल्मों में स्कूल-कॉलेज को नायक-नायिका के मिलन स्थल या नाच-गानों के मैदान के तौर पर पेश किया गया। फिल्में जब फार्मूलों के फेर में रहती हैं तो पर्दे पर छात्रों और शिक्षकों का स्वाभाविक रूप नहीं उभर पाता।