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इतिहास के झरोखे से: लता मंगेशकर की वो 5 सुपरहिट फिल्में जिसने सिनेमाई संगीत को बदल डाला

Lata Mangeshkar Best Songs: सुरों की मल्लिका लता मंगेशकर ने कैसे भारतीय सिनेमा में संगीत को एक नया आगाज दिया, उसी के बारे में आज जानते हैं।

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मुंबई

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Abhishek Mehrotra

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Yatindra Mishra

Feb 24, 2026

Lata Mangeshkar Best Songs

लता मंगेशकर (सोर्स- एक्स)


Lata Mangeshkar Best Songs: लता मंगेशकर ने अपनी आवाज की चिरदैवीय मौजूदगी से पिछली लगभग अर्धसदी को इतने खुशनुमा ढंग से रोशन किया है कि हम आज आसानी से इस बात का अंदाजा ही नहीं लगा सकते कि अगर भारतीय फिल्म संगीत के परिदृश्य पर 1947 में लता मंगेशकर की आमद न होती, तो आज पिछली शताब्दी उतनी संगीतमय और सुरीली भी न होती, सौभाग्य से जो वो हो पायी है।

लता मंगेशकर के आगमन का समय सिर्फ किसी नये सांस्कृतिक घटना का वर्ष ही नहीं, वरना वो भारतीय राजनैतिक इतिहास के भी नवजागरण का ऐसा काल है, जिस वर्ष भारत ने स्वाधीनता का नया उजाला देखा था।

लता मंगेशकर का हिंदी सिनेमा में शानदार योगदान (Lata Mangeshkar Contribution)

ये संयोग खासा काबिलेगौर इसलिए भी है कि जैसे-जैसे भारतीय जनमानस अपनी नयी सोच और उत्साह के साथ जीवन में आगे बढ़ता जा रहा था, लता मंगेशकर की मौजूदगी में हिन्दी फिल्म संगीत भी आनन्द और स्फूर्ति के साथ उसी रास्ते जा रहा था। ये अकारण नहीं है कि 1948 में मास्टर गुलाम हैदर के संगीत-निर्देशन की फिल्म ‘मजबूर’ का लता-मुकेश का गाया हुआ युगल-गीत ‘अब डरने की बात नहीं अंग्रेजी छोरा चला गया, वह गोरा-गोरा चला गया’ जैसे हर एक भारतीय की सबसे मनचाही अभिव्यक्ति बन गया था।

उन्हीं मास्टर गुलाम हैदर ने भारत में अपने संगीत करियर का आखिरी गाना लता जी से ‘पद्मिनी’ (1948) में गवाया- ‘बेदर्द तेरे दर्द को सीने से लगा के’ और उसी दिन, जिस रात ये गीत स्टूडियो में रिकॉर्ड हुआ, वो भारत छोड़कर पाकिस्तान चले गये। लता जी के संगीत-जीवन के साथ इस तरह की न जाने कितनी ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप में बदल चुकी तिथियां भी जुड़ी हुई हैं, जो आज भारतीय समाज में अपना कुछ दूसरा ही मुकाम रखती हैं।

लता मंगेशकर ने फिर से सिनेमा को जगाया (Lata Mangeshkar Best Songs)

एक लता मंगेशकर का होना, इस लिहाज से बहुत सारी ऐसी परिस्थितियों के जन्म का कारण भी गाहे-ब-गाहे बनता रहा है, जिसमें हिन्दी फिल्म संगीत को अपनी एक स्वतंत्र और अलग ढंग का रूप निर्धारण करने में मदद मिली है। ये देखने की बात है कि उनके संगीत के दृश्यपटल पर आने वाला वर्ष (1947) ही वो साल रहा, जिसमें के.एल. सहगल का इन्तकाल हो चुका था और मलका-ए-तरन्नुम नूरजहां, विभाजन के बाद पाकिस्तान चली गयीं थीं।

ये एक प्रकार से फिल्मेतिहास का ऐसा नाजुक दौर भी था, जिसमें इन दो मूर्धन्यों की भरपाई का अकेला जिम्मा जिन लोगों के कन्धे पर आया, उनमें से एक सबसे प्रमुख किरदार लता मंगेशकर भी हैं। जाहिर है, संक्रमण के इस काल में मास्टर गुलाम हैदर की खोज पर दांव लगाते हुए लता के भीतर छिपी हुई किसी बड़ी प्रतिभा की पहचान खेमचन्द प्रकाश, अनिल विश्वास, हुस्नलाल-भगतराम, नौशाद और शंकर जयकिशन जैसे दिग्गज संगीत निर्देशकों ने की।

1949 के दौरान पांच बड़ी फिल्में (Lata Mangeshkar Best Songs)

इन्हीं लोगों के चलते 1949 के दौरान उनकी पांच महत्त्वपूर्ण फिल्में हिन्दी सिनेमा के संगीत परिदृश्य को एकाएक बदलने के लिए आ गयीं। ये फिल्में हैं- महल, बड़ी बहन, लाडली, अन्दाज और बरसात।

इसके बाद तो जैसे पुरानी मान्यताओं, स्थापित शीर्षस्थ गायिकाओं एवं संगीत-प्रधान फिल्मों के स्टीरियोटाईप में बड़ा परिवर्तन दिखने लगता है। लता, खुशनुमा आजादी की तरह ही एक नये ढंग की ऊर्जा, आवाज के नयेपन और शास्त्रीय संगीत की सूक्ष्म पकड़ के साथ हिन्दी फिल्म संगीत के लिए सबसे प्रभावी व असरकारी उपस्थिति बनने लगती हैं।

‘हवा में उड़ता जाये मेरा लाल दुपट्टा मलमल का’ (बरसात) जैसा गीत उसी बहाव के साथ नये क्षितिज की ओर फिल्म संगीत को उड़ा ले जाता है, जो अभी तक भारी-भरकम आवाजों की घूंघट में पल रहा था।