
Ram Gopal Varma (सोर्स- एक्स)
Ram Gopal Varma On Social Media Ban For Children: देश में 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने की बहस तेज होती जा रही है। इसी मुद्दे पर फिल्म निर्देशक राम गोपाल वर्मा ने अपनी बेबाक और तीखी राय रखी है। उन्होंने सोशल मीडिया पर एक लंबा नोट लिखते हुए इस प्रस्ताव पर सवाल उठाए और इसे बच्चों के भविष्य के लिए नुकसानदेह बताया। वर्मा ने अपने इस विचार को प्रतीकात्मक नाम दिया- ‘बैन द बैनर्स’। रामू ने क्या कुछ कहा, चलिए जानते हैं।
राम गोपाल वर्मा का मानना है कि बच्चों को 'सुरक्षा' के नाम पर सोशल मीडिया से दूर रखना दरअसल उन्हें एक तेजी से बदलती डिजिटल दुनिया में पीछे धकेलने जैसा है। उन्होंने कहा कि आज के दौर में सोशल मीडिया सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं रहा, बल्कि ये ज्ञान, कौशल और वैश्विक संपर्क का सबसे बड़ा जरिया बन चुका है। ऐसे में बच्चों को इससे वंचित करना उन्हें प्रतिस्पर्धा में कमजोर बना सकता है।
राम गोपाल वर्मा ने उस सोच पर भी सवाल उठाया, जिसमें सोशल मीडिया को केवल समय बर्बाद करने वाला प्लेटफॉर्म माना जाता है। उनके अनुसार, आज बच्चे यूट्यूब, रेडिट और टिकटॉक जैसे प्लेटफॉर्म्स से कोडिंग, नई भाषाएं, बिजनेस आइडियाज, साइंस और करंट अफेयर्स तक सीख रहे हैं। कई मामलों में यह सीख पारंपरिक क्लासरूम से कहीं तेज़ और प्रभावी है।
उनका तर्क है कि जिन देशों में सोशल मीडिया पर इस तरह की पाबंदी नहीं है, वहां के बच्चे कम उम्र में ही यह समझने लगते हैं कि डिजिटल जानकारी कैसे बहती है, ऑनलाइन समुदाय कैसे बनते हैं और विचारों का आदान-प्रदान किस तरह होता है। यही शुरुआती समझ आगे चलकर आत्मविश्वास और डिजिटल साक्षरता में बदलती है।
राम गोपाल वर्मा ने चेतावनी दी कि अगर कुछ देशों में बच्चों को सोशल मीडिया से दूर रखा गया, तो ये एक असमान प्रतिस्पर्धा की स्थिति पैदा करेगा। जहां एक ओर खुले माहौल में पले-बढ़े बच्चे डिजिटल टूल्स के अभ्यस्त होंगे, वहीं प्रतिबंध झेलने वाले बच्चे इनसे काफी देर से रूबरू होंगे। यह देरी आगे चलकर सीखने, सोचने और अवसरों को पकड़ने की क्षमता पर असर डाल सकती है।
उनके मुताबिक, सोशल मीडिया पर रोक लगाने से जोखिम खत्म नहीं होते, बल्कि वो बस आगे के लिए टल जाते हैं। बच्चे किसी न किसी मोड़ पर डिजिटल दुनिया में कदम रखेंगे ही, लेकिन बिना सही मार्गदर्शन के। ऐसे में खतरा और भी बढ़ सकता है।
राम गोपाल वर्मा ने इसे अल्पकालिक सुरक्षा और क्षमता के बीच का सौदा बताया। उनका कहना है कि आज सूचना की रफ्तार ही व्यक्तिगत और राष्ट्रीय प्रगति तय करती है। अगर हम बच्चों को इस रफ्तार से दूर रखते हैं, तो हम अनजाने में उन्हें वैश्विक स्तर पर पीछे छोड़ रहे हैं।
हालांकि, इस मुद्दे पर राय बंटी हुई है। जहां एक पक्ष बच्चों की मानसिक सेहत, स्क्रीन एडिक्शन और ऑनलाइन खतरों को लेकर सख्त नियमों की वकालत करता है, वहीं दूसरा पक्ष मानता है कि समाधान पूर्ण प्रतिबंध नहीं, बल्कि बेहतर डिजिटल शिक्षा, माता-पिता की निगरानी और प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही है।
Updated on:
09 Feb 2026 03:30 pm
Published on:
09 Feb 2026 03:29 pm
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