
खंडहरों में बदली नैनवां की बसावट की साक्षी निजी हवेलियां
खंडहरों में बदली नैनवां की बसावट की साक्षी निजी हवेलियां
सार-संभाल नहीं होने से हवेलियों के आधे हिस्से खंडहर हो गए
नैनवां. किसी कस्बे व शहर में बनी पुरानी हवेलियां भी यह बयां कर देती है कि कस्बा या शहर कितना पुराना बसा हुआ है। बसावट की उम्र की साक्षी हवेली में अब कोई नहीं रहने व वक्त की मार से भले ही खंडहर होती जा रही है, लेकिन आज भी उनकी पहचान बनी हुई है। नैनवां में भी ऐसी आधा दर्जन निजी हवेलियां जो खंडहर हो चुकी है, लेकिन आज में भी उनके अन्दर के हिस्से सुरक्षित होने से कस्बे की बसावट की साक्षी है। हवेलियां बनाने वाले पुरखों के उत्तराधिकारी अब इन हवेलियों में नहीं रहते। वक्त की मार व सार-संभाल नहीं होने से हवेलियों के आधे हिस्से खंडहर हो गए। उसके बाद भी तीन मंजिल वाली हवेलियों के आधे हिस्सों झरोखें, खम्भोंं पर खड़ी तिबारियां, रोशनदान, जंगलें, लकड़ी व पत्थरों से बने बारसोत, किवाड़, ड्योढ़ीनुमा सीढिय़ां व अन्य हिस्से हवेली के रूप में खड़े हंै। जो अब ढहने के कगार पर आ गए। कस्बे में रियासतकाल में मारवाड़ा मोहल्लें में स्थित मारवाड़ों की हवेलियां, लोहड़ी चौहटी के पास पौद्दारों की खंडहर हवेली का अधिकांश हिस्सा ध्वस्त हो चुका।
अब कोई नहीं रहता हवेलियों में
नैनवां पहले खेड़ों के रूप में बसा था, जो बूंदी रियासत के अधीन था। बूंदी रियासत ने नाहर खानसिंह को नैनवां का किलेदार नियुक्त करने के बाद उनके द्वारा 84 खेड़ों को मिलाकर नैनवां को दोबारा टाउप प्लांनिंग के हिसाब से बसाया था। रियासतकाल में शासक जितना ध्यान रियासत की सुरक्षा पर रखा करते थे, उतना ध्यान अपनी रिेयासत में व्यापार व अािर्थक मजबूती पर रखा जाता था। शासकों की ओर से उस जमाने में कस्बे के सबसे बड़े सेठ-साहूकारों ही उस रियासत के आर्थिक स्तम्भ हुआ करते थे। शासक सेठ-साहूकारों को रियासत के आर्थिक सलाहकार को बड़ा दिया जाता था। शासकों से उस नैनवां के कुछ परिवारों को सेठ-साहूकारों का दर्जा मिला हुआ था। जिनके द्वारा अपनी निजी हवेलियां बनाई थी। इन परिवारों का कुटुम्ब बढ़ता गया। वैसे-वैसे ही परिवार के सदस्य हवेलियों को छोड़ दूसरे स्थानों पर बसते गए। हवेलियां निजी होने से आज भी उनके परिवारों के नाम से ही जानी जाती है। उनमें कोई नहीं रहने से सूनी पड़ी है।
लोगों की जुबानी
पौद्दार परिवार के 82 वर्षीय उच्छबलाल पौद्दार बताते है कि पांच पीढ़ी के पहले के पुरखों ने हवेली का निर्माण कराया था। जिससे पौद्दारों की हवेली कहा जाता है। हमारा गौत्र तो मित्तल है लेकिन उस समय परिवार को बूंदी रियासत की ओर से पौद्दार व पटवारी का दर्जा मिला हुआ था। रियासत का राजकाज व आय बढ़ाने के लिए आर्थिक सलाहकार भी हुआ करते थे। उनके जिन पुरखों को पटवारी का दर्जा दिया गया था, उनके द्वारा ही हवेली बनाई गई थी। उनके उत्तराधिकारी बाहर चले गए। तब से सूनी पड़ी ढहती गई।
मारवाड़ा परिवार के 75 वर्षीय महावीर मारवाड़ा बताते है कि चार पीढ़ी पहले पुरखों में मारवाड़ा परिवार के दो भाई जगराम व गोपीराम थे। उस समय बूंदी रियासत को आवश्यकता पडऩे पर आर्थिक मदद करते थे। जिससे बूंदी रियासत की ओर से सेठ-साहूकार का दर्जा मिला हुआ था। उनके समय में ही मारवाड़ा की हवेली का निर्माण कराया था। कुटुम्ब बढ़ता गया, परिवार हवेली छोड़ बाहर मकान बनाते गए, कुछ परिवार बाहर भी रहने लग गए। अब हवेली सूनी पड़ी।
Published on:
26 Dec 2021 07:29 pm
