
बूंदी। सैकड़ों वर्ष पूर्व गणगौर का त्योहार बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता था। बूंदी हाड़ास की गणगौर राजस्थान भर में काफी प्रसिद्ध थी। लेकिन 17वीं शताब्दी में बूंदी रियासत में गणगौर उत्सव के दौरान हुई दुर्घटना के बाद यहां गणगौर की पूजा केवल घरों तक ही सीमित होकर रह गई है। इस हादसे के बाद बूंदी में गणगौर के सार्वजनिक उत्सव पर आज तक अघोषित प्रतिबंध लगा हुआ है।
17वीं सदी में बूंदी के राजा महाराव बुध सिंह के छोटे भाई की गणगौर उत्सव के दौरान एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई। तभी से राजपरिवार ने गणगौर का त्यौहार मनाना बंद कर दिया। जानकारी के मुताबिक, महाराव बुध सिंह के शासनकाल 1695 से 1740 तक उनके छोटे भाई जोध सिंह जैतसागर में सरदार व रूपाओं के साथ गणगौर दरीखाना स्थापित कर भ्रमण कर रहे थे। इस दौरान जैतसागर में एक मदमस्त हाथी ने गणगौर सहित पूरी नाव पलट दी, जिससे राजा के छोटे भाई सहित कुछ जागीरदारों की मौत हो गई। तब से बूंदी का पूर्व राजपरिवार सार्वजनिक रूप से गणगौर उत्सव नहीं मनाता है।
बूंदी की गणगौर के बारे में एक और कथा प्रचलित है। जिसके अनुसार 13वीं शताब्दी में शेरगढ़ के महाराजा हरराज सिंह ने बूंदी के राव राजा नापा को हराकर गणगौर को छीन लिया था। कुछ वर्षों के बाद नापा के पुत्र हम्माजी ने शेरगढ़ के महाराज हरराज सिंह को युद्ध में हरा दिया और बूंदी की गणगौर को वापस ले आए। उसके बाद 17वीं सदी में जैतसागर झील में हुए हादसे तक गणगौर का त्योहार मनाने की परंपरा जारी रही। झील हादसे के बाद राजपरिवार की गणगौर का त्यौहार मनाना बंद कर दिया।
Published on:
11 Apr 2024 07:05 pm
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