
बूंदी. शिव भक्त महादेव और देवी पार्वती के विवाह की वर्षगांठ के तौर पर मनाते हैं। इस मौके पर मंदिरों में भगवान शिव की मूर्तियों का दूध, गुलाब जल, चंदन, दही, शहद, चीनी और पानी से अभिषेक किया जाता है। इस बार दो दिन महाशिवरात्रि की धूम रहेगी।
विशेष महत्व
कर्पूर से आरती करने पर कष्ट दूर होते हैं।
घी से आरती करने पर मानसिक शुद्धि होती है।
सरसों तेल के दीपक से आरती शत्रु समाप्त करती
महापूजन की विधि-
भगवान शिव का जल, दूध, पंचामृत से अभिषेक कर वस्त्र धारण कराएं (पोशाक पहनाए), चंदन का तिलक लगाएं, पुष्प, बिल्व पत्र, बेल फल, आक, धतूरा, काले तिल चढ़ाएं, आरती के उपरांत भांग, ऋतु फल का भोग लगाएं। पूजन के दौरान पंचाक्षर ऊं नम: शिवालय का उच्चारण करें? शिवरात्रि ि के दिन शिव चालीसा, शिव महिमा स्त्रोत व महामृत्युंजय मंत्र का जाप करना विशेष फलदायी माना गया है।
महाशिवरात्रि का महत्व-
महाशिवरात्रि के पर्व का उत्सव एक दिन पहले ही शुरू हो जाता है. महाशिवरात्रि की पूरी रात पूजा और कीर्तन किया जाता है. इतना ही नहीं कई पुराण के अंदर शिवरात्रि का उल्लेख मिलेगा, विशेषकर स्कंद पुराण, ***** पुराण और पद्म पुराणों में महाशिवरात्रि का उल्लेख किया गया है. शैव धर्म परंपरा की एक पौराणिक कथा अनुसार, यह वह रात है जब भगवान शिव ने संरक्षण और विनाश के स्वर्गीय नृत्य का सृजन किया था. हालांकि कुछ ग्रंथों में यह दावा किया गया है कि इस दिन भगवान शिव और देवी पार्वती का विवाह हुआ था.
जानकारी के अनुसार साल में दो बार शिवरात्रि मनाई जाती है। प्रथम फाल्गुन मास कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को और दूसरी श्रावण मास कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को। फाल्गुन माह की शिवरात्रि को महाशिवरात्रि के रूप में मनाया जाता है क्योंकि इस दिन शिव पार्वती का विवाह हुआ था। साथ ही इसी दिन भगवान शिव का स्वरूप शिवलिंग भी उदित माना गया है। महाशिवरात्रि के दिन निशिदकाल में शिव की पूजा करने से मनोकामनाएं पूरी होती है। 13 फरवरी को रात 10.04 बजे से चतुर्दशी शुरू हो जाएगी। यह अगले दिन 14 फरवरी को रात 12.47 तक रहेगी। शिवजी की अराधना के लिए चार प्रहर में पूजा का महत्व बताया है जो 13 फरवरी की रात में होगा।
मंगलवार को महाशिवरात्रि का महत्व -
शिव के एकादश अवतार के रूप में रुद्रावतार हनुमान थे। उनके प्रिय वार मंगलवार को महाशिवरात्रि का पर्व आ रहा यह 27 फरवरी 1968 के बाद बन रहा है। इसी दिन सूर्य व बुध के योग से बुद्धादित्य एवं मंगल व शुक्र के दृष्टि संबंध से स्नेह योग के अलावा सिद्ध योग भी रहेगा। यह प्रदोषयुक्त यानि त्रयोदशी युक्त महाशिवरात्रि होगी। धर्म सिंधु के अनुसार त्रयोदशीयुक्त चतुर्दशी मंगलवार होने पर भगवान भोले शंकर की पूजा-अर्चना करने से भक्त को शिव की अनन्य भक्ति का फल प्राप्त होता है।
ऐसे करे पूजन-
वृषभ- शिवलिंग को ईख के रस से स्नान कराए
मिथुन- लाल गुलाल, कुमकुम, चंदन, इत्र से अभिषेक करें।
कर्क- शिवरात्रि पर चंदन से अभिषेक करें।
सिंह- फलों के रस और शकर की चाशनी से अभिषेक करें।
कन्या- धतूरा, भांग, आंकड़ें के फूल चढ़ाएं,
तुला- फूलों के जल से शिवलिंग को स्नान कराएं।
वृश्चिक- शिवलिंग को शहद, घी से स्नान कराने बाद पुन: जल से स्नान कराएं
धनु- चावल से श्रृंगार करें, सूखे मेवे का भोग लगाएं।
मकर- गेहूं से शिवलिंग को ढंककर विधिवत पूजन करें।
कुंभ- सफेद-काले तिलों को मिलाकर किसी ऐसे शिवलिंग पर चढ़ाएं जो एकांत में हो।
मीन- रात्रि में पीपल के नीचे बैठकर शिवलिंग का पूजा करें।
Published on:
13 Feb 2018 01:09 pm
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