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Sawan special: सावन का महीना उल्लास और उमंग…झूलों की पींगों और मल्हार के बोलों संग जीता है

सावन में कई परंपराएं लोगों के प्रकृति प्रेम और आपसी समन्वय और प्रेम को दर्शाती है

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Sawan special traditions in Sawan reflect the nature and love

Sawan special: सावन का महीना उल्लास और उमंग...झूलों की पींगों और मल्हार के बोलों संग जीता है

बूंदी. सावन का महीना उल्लास और उमंग का है। सावन में कई परंपराएं लोगों के प्रकृति प्रेम और आपसी समन्वय और प्रेम को दर्शाती है। घेवर की मिठास, मेहंदी की खुशबू और रंगत के साथ नवविवाहिता उत्सुक है। इधर महिलाओं के लिए मार्केट में लहरिया की धूम मची है।

शादी के बाद पहले सावन को लेकर नवविवाहितों में खासा उत्साह है, ससुराल से सावनी की भेंट में लहरिया सहित कई गिफ्ट्स को लेकर खासा क्रेज है, पत्रिका ने ऐसी ही महिलाओं से बात की ओर जाना उनके लिए सावन के क्या है मायने

सावन की झमाझम से सजी-संवरी, इठलाती, मुस्काती धरा सावन के पग पडते ही खिलखिलाती उठी है। इसका रोम-रोम, कण-कण पुलकित है। नव पल्लव झूमते हैं, डालियां अगडाइयां लेती हैं। मोर, पपीहा, दादुर सभी मनभावन सावन की अगुवाई में सरगम सजाते हैं तो लोक जीवन कैसे ना गाए, कैसे ना नाचे ! इस मनभावन सावन में जन मन इसी उल्लास को झूलों की पींगों और मल्हार के बोलों संग जीता है। देवालयों से लेकर गली-मोहल्लों, बाग-बगीचों और घर के अहातों में झूलों के नजारे और झूलों के गीत इस महीने का सौन्दर्य और भी बढ़ा देते हैं।


सावन का महीना शुरू होने के साथ ही मंदिरों में हिंडोले गढने यानी भगवान के झूले पर विराजने और भक्तों द्वारा उन्हें झुलाने की परम्परा चली आ रही है। इस मौके पर मंदिरों में या सामाजिक तौर पर होने वाले संकीर्तनों में झूले के गीत ही प्रमुखता से गाए जाते हैं।

कृष्ण सावन आते ही राधा का झूला झूलने के लिए आह्वान कुछ इस तरह करते हैं, राधे झूलन पधारो घिर आए बदरा..., और जब मुरलीधर की मनुहार को मान कर झूलने आ पहुंची तो कोकिल कंठ गा उठते हैं... हिंडोला कुंज वन डाला रे, झूलन आई राधिका प्यारी रे...। ये मधुर गीत सावन को और सजीला, अधिक सुरीला बना देते हैं।

ब्रज धरा पर आज भी हर ओर ऐसे लोक संगीत की धुनें कानों में मिश्री घोलती हैं। मंदिरों में लहरिया परिधानों में श्रंृगारित राधा रानी और मनमोहक रूप में सजे बांके बिहारी की हिंडोले में झूला झूलती छवि और उस पर ये मधुर मादक संगीत की रिमझिम अलौकिक अनुभव देती है। हरियाली तीज पर महिला मंडल और क्लब जैसे संगठनों ने भी झूला झूलने जैसी परम्पराओं को पुन: जीवन दिया है।


सावन तो आयो, चलो बागन में चलो झूला झूलबे


हरियाली से भरी हाडोती की धरती और महिलाओं के मन अब गीत गुनगुनाएंगे। असल में यही वो महीना है, जब बादल बरसते हैं तो पूरी प्रकृति खिली-खिली सी नजर आती है। पेड़ों पर झूले पड़ चुके हैं यानि पूरे माह सावन की धूम देखने को मिलेगी। मार्केट भी सावन के रंग में नजर आ रहा है। ऐसी परंपरा जिसमें विवाहित बेटियों को मायके वालों की तरफ से शगुन के तौर पर कपड़े, मिठाइयां आदि भेजी जाती हैं।

- छत्रपुरा निवासी रेखा शर्मा के घर सावन की खुशियों की धूम मची है। शादी के बाद पहला सावन है, ऐसे में जयपुर से खास शॉपिंग की जा रही है। नंदकवर बताती है कि वे बहू के लिए सरप्रराइज होगा उनके लिए स्पेशल जयपुर से घेवर और लहरिया व सोने का हार बनाया है। रेखा भी शादी के बाद पहले सावन को लेकर उत्साहित है, पीहर जाने के बाद ससुराल की तरफ से दिए जाने वाले गिफ्ट्स को लेकर एक्साइटेड है।

ईश्वरीय निवास रोहिणी हाड़ा का कहना है कि सावन की कई परम्पराएं जो लोगों के प्रकृति प्रेम और आपसी समन्वय और प्रेम को दर्शाती है। इस परम्परा को महिला मंडल हर साल मनाता आ रहा है, इस बार भी तीज खास मनाई जाएगी। सावन की थीम पर महिलाएं आयोजन करेगी।

-देवपुरा निवासी उमा शर्मा बताती है कि सावन आने का इंतजार बेसब्री से रहता है। इस बार सावन की बात कुछ ओर होगी। सामुहिक रूप से सज धज कर इस परम्परा को उत्साह के साथ मनाते है।