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विश्व बैंक के हिसाब से 18 साल से लोअर-मिडिल कैटेगरी से आगे नहीं बढ़ पाया है भारत

GDP Growth के ताजा आंकड़ों पर विवाद हो गया है, लेकिन असली सवाल है कि आय के आधार पर हर आदमी कब मजबूत होगा? जब तक ऐसा नहीं होगा तब तक जीडीपी का मतलब आम आदमी के लिए क्या होगा?
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India’s 7.8% GDP Growth,Factors powering the economy despite global turmoil,

GDP के ताजा आंकड़े पर विवाद के बीच जरूरी है समझना कि विश्व बैंक के पैमाने पर हमें जल्दी ऊपर उठना होगा। (इमेजिंग सोर्स: एआई)

वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही के जीडीपी आंकड़ों पर विवाद हो गया है। सरकार ने बताया है कि जून में खत्म हुई तिमाही में जीडीपी ग्रोथ रेट 7.8 प्रतिशत रही। ईरान-अमेरिका युद्ध के दौर में यह आंकड़ा उत्साहित करने वाला है। लेकिन, कुछ विशेषज्ञ इस पर सवाल उठा रहे हैं। इस बीच विश्व बैंक के पैमाने पर देखें तो आय के आधार पर भारत 18 साल से लोअर-मिडिल इनकम कैटेगरी की अर्थव्यवस्था वाले देश में ही शामिल है, जबकि ताईवान 16 साल में और साउथ कोरिया 18 साल में लोअर-मिडिल से निकल कर अपर-मिडिल कैटेगरी में आ चुका था।

कांग्रेस ने पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग का हवाला देकर आरोप लगाया है कि सरकार ने जीडीपी के ताज आंकड़े देने में हेराफेरी की है। बता दें कि सरकार ने 2025-26 का जीडीपी पहले 86 लाख करोड़ रुपये बताया था, लेकिन बाद में इसे संशोधित कर 80 लाख करोड़ बताया गया। गर्ग ने इस पर सवाल खड़े किए थे, जिसे खेड़ा ने भी मोदी सरकार पर हमला करने के लिए इस्तेमाल किया।

भारत सरकार ने 31 अगस्त को बताया था कि 2027 की पहली तिमाही में देश की वास्तविक जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) में वृद्धि की दर 7.8 प्रतिशत रही है। 2026 की पहली तिमाही में यह आंकड़ा 6.9 प्रतिशत था। इस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुशी जताई थी।

इस आंकड़े से जहां सरकारी पक्ष और कई विशेषज्ञ बेहद उत्साहित है, वहीं विपक्ष और कई विशेषज्ञ इस पर सवाल भी उठा रहे हैं।

अच्छी ग्रोथ रेट के पीछे क्या कारण हो सकते हैं?

पश्चिम एशिया में संघर्ष के बावजूद जीडीपी का यह आंकड़ा उत्साहित करने वाला है, क्योंकि यह ज़्यादातर अनुमानों से अलग है। भारत में बीते तीन वित्त वर्षों जीडीपी ग्रोथ रेट सात फीसदी से ऊपर ही दर्ज हुई है। साथ ही महंगाई दर भी गिरी है। कुछ जानकारों की नजर में इसका एक कारण रेपो दर (जिस दर पर रिजर्व बैंक वाणिज्यिक बैंकों को कर्ज देता है) में कमी हो सकती है। रिजर्व बैंक ने दिसंबर 2024 से दिसंबर 2025 के बीच 125-बेसिस पॉइंट (1.25 पर्सेंटेज पॉइंट्स) की कमी की थी। 2025 में जीएसटी दरें घटाई गई थीं। जीडीपी बढ़ने के पीछे एक कारण यह भी हो सकता है।

विश्व बैंक की नजर में भारत अभी भी लोअर-मिडिल कैटेगरी में

विश्व बैंक की नजर में भारत की अर्थव्यवस्था अभी लोअर-मिडिल (निम्न-मध्य) कैटेगरी में ही आती है। लो-इनकम से लोअर-मिडिल में आने में भारत को 48 साल लग गए और बीते 18 साल से भारतीय अर्थव्यवस्था लोअर-मिडिल कैटेगरी में ही है। विश्व बैंक के पैमाने पर इसके बाद दो और कैटेगरी हैं- अपर-मिडिल (उच्च-मध्य) और हाई (उच्च)। इस पैमाने पर भारत और बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था इस समय एक ही कैटेगरी (लोअर-मिडिल) में आती है। बांग्लादेश को लो-इनकम से लोअर-मिडिल कैटेगरी में आने में 54 साल लगे, जबकि भारत 48 साल में इस कैटेगरी में आ गया था। चीन ने इसके लिए मात्र 38 साल लिए थे। चीन 16 साल से अपर-मिडिल कैटेगरी में बना हुआ है।

इस बार 1 जुलाई, 2026 को विश्व बैंक द्वारा जारी रिपोर्ट के मुताबिक श्रीलंका ने छलांग लगाते हुए अपर-मिडिल कैटेगरी में जगह बनाई है। उसके साथ जॉर्डन, माइक्रोनेशिया, फिलीपींस और वियतनाम भी मिडिल-कैटेगरी की अर्थव्यवस्था वाले देश बन गए हैं।

विश्व बैंक कैसे तय करता है कैटेगरी

विश्व बैंक का डेवलपमेंट डाटा ग्रुप हर साल 1 जुलाई को यह बताता है कि दुनिया के किस देश की अर्थव्यवस्था चार में से किस कैटेगरी की है। यह पिछले कैलंडर वर्ष के दौरान प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय [gross national income (GNI) per capita] के आधार पर तय होता है। इसी लिस्ट के आधार पर विश्व बैंक तय करता है कि किस देश को रियायती दर पर लोन या विकास के लिए मदद दी जानी चाहिए।

अब यह भी जान लेते हैं कि प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय की गणना कैसे होती है। इसे एटलस मेथड के जरिए डॉलर में आंका जाता है। अब आप सोच रहे होंगे कि एटलस मेथड क्या है? एटलस मेथड नाम विश्व बैंक के एक दस्तावेज (एटलस ऑफ ग्लोबल डेवलपमेंट) पर पड़ा है। इसके तहत मुद्रा के विनिमय दर में होने वाले उतार-चढ़ाव को संतुलित कर दिया जाता है। इसके लिए तीन साल की वृद्धि का औसत लेकर कीमत को समायोजित कर कन्वर्जन फैक्टर को एडजस्ट किया जाता है।