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दादी-मां के गहनों से दूरी बना रहे युवा! आखिर क्यों बदल रही है सोने को लेकर नई पीढ़ी की सोच?

Old Gold Exchange: नई पीढ़ी सोने को विरासत नहीं, बल्कि निवेश और आर्थिक सुरक्षा का साधन मान रही है। इसी बदलाव के चलते गहनों की मांग घटी है, जबकि गोल्ड बार, कॉइन और गोल्ड ETF में निवेश तेजी से बढ़ा है।
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Gold jewellery and investment trend

file photo patrika

Gold Investment Trend: अलमारी के लॉकर में सालों से संभालकर रखा दादी का हार हो, मां की चूड़ियां हों या शादी का सेट…भारतीय परिवारों में सोना रिश्तों की धरोहर, सुरक्षा और परंपरा का प्रतीक रहा है। लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। जो गहने कभी पीढ़ियों तक विरासत के रूप में संभालकर रखे जाते थे, नई पीढ़ी के लिए यह मल्टीपर्पज एसेट बन गए हैं। यानी युवा पीढ़ी खासकर जेन-जेड और मिलेनियल्स आर्थिक सुरक्षा, निवेश, घर खरीदने, उच्च शिक्षा और उद्यम शुरू करने जैसे जीवन के बड़े लक्ष्यों को पूरा करने वाली संपत्ति के रूप में देखने लगी है। भारतीय घरों में स्वर्णाभूषण को स्त्रीधन और इमरजेंसी फंड की तरह देखा जाता है, लेकिन युवा पीढ़ी इसे डेड इन्वेस्टमेंट मानती है। यही वजह है कि परिवार के पुराने गहने अब निवेश और भौतिक जरूरतों के लिए इस्तेमाल किए जा रहे हैं।

यही वजह है कि देश में गहनों की मांग घट रही है, जबकि निवेश के रूप में सोने की खरीद लगातार बढ़ रही है। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के अनुसार, 2026 की पहली तिमाही में सोने के गहनों की नेट डिमांड 30 प्रतिशत रही, जो पिछले 26 सालों में सबसे निचला स्तर है। वहीं, निवेश जैसे बार, कॉइन और ईटीएफ की हिस्सेदारी सबसे अधिक 70 प्रतिशत दर्ज की गई। इतना ही नहीं इस अवधि में 40 प्रतिशत से 60 प्रतिशत ज्वेलरी की बिक्री पुराने सोने के एक्सचेंज के जरिए हुई। यानी, बड़ी संख्या में ग्राहक नया सोना खरीदने की बजाय पुराने गहनों को एक्सचेंज कर हल्की ज्वेलरी चुन रहे हैं।

बदल रही पारिवारों की सोच

नई पीढ़ी सोने को केवल आभूषण नहीं, बल्कि 'लिक्विड एसेट' यानी जरूरत पड़ने पर तुरंत इस्तेमाल की जा सकने वाली संपत्ति मान रही है। पहले जहां शादी या त्योहारों के लिए भारी गहने खरीदे जाते थे, वहीं अब लोग हल्की ज्वेलरी, गोल्ड बार, कॉइन और गोल्ड ईटीएफ को प्राथमिकता दे रहे हैं। इसके पीछे रिकॉर्ड ऊंची कीमतें, सुरक्षा की चिंता, मेकिंग चार्ज और बदलती जीवनशैली जैसे कई कारण हैं।

नई पीढ़ी क्यों बना रही है गहनों से दूरी?

  • मेकिंग चार्ज और छीजत: ज्वेलरी खरीदते समय 10 प्रतिशत से 25 प्रतिशत तक का मेकिंग चार्ज देना पड़ता है, जो बेचते वक्त काउंट नहीं होता। छीजत अलग कम होती है। इसके मुकाबले गोल्ड बार, कॉइन और ईटीएफ खरीदना-बेचना अपेक्षाकृत आसान होता है।
  • लॉकर का खर्च: भारी गहनों को सुरक्षा के लिए बैंक लॉकर में रखना पड़ता है, जिसका सालाना किराया अलग से चुकाना पड़ता है।
  • ओल्ड गोल्ड एक्सचेंज: ज्वेलर्स का कहना है कि वर्तमान में उनकी 40 प्रतिशत से 60 प्रतिशत बिक्री पुराने सोने के बदले नई ज्वेलरी बदलने से आ रही है। लोग भारी गहने देकर 'लाइटवेट' या स्टडेड (रत्न जडि़त) ज्वेलरी ले रहे हैं।

सोने की मांग में बदलाव

पहली तिमाही में सोने की मांग20252026बदलाव
ज्वेलरी81 टन66 टन▼ 19%
निवेश (बार, कॉइन, ETF)53 टन82 टन▲ 54%
कुल मांग137 टन151 टन▲ 10%

निवेश में रिकॉर्ड उछाल (पहली तिमाही)

निवेश का माध्यम20252026बदलाव
बार व कॉइन पर खर्च389 अरब रुपए941 अरब रुपए▲ 142%
गोल्ड ETF में निवेश56 अरब रुपए300 अरब रुपए▲ 436%

2011 में जहां 78 टन रिसायकल्ड सोना खरीदा गया, वहीं 2025 में करीब 140 टन रिसायकल्ड सोना खरीदा गया।
(स्रोत:वर्ल्ड गोल्ड कौंसिल )

केस स्टडी: 2 किलो सोना बना 8 करोड़ की संपत्ति का आधार

अहमदाबाद के एक मारवाड़ी परिवार ने 2017 में लगभग 2 किलो सोना बेचने के बजाय उस पर गोल्ड लोन लिया और उसी पूंजी से जमीन खरीदी। नौ वर्षों में जहां जमीन का मूल्य कई गुना बढ़ा, वहीं सोने की कीमत भी रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई। परिणामस्वरूप दोनों परिसंपत्तियों का संयुक्त मूल्य 8 करोड़ रुपये से अधिक हो गया। वित्तीय सलाहकार इसे 'एसेट लीवरेज' का सफल उदाहरण मानते हैं।

दादी के गहनों से खरीदा पहला घर

मुंबई के एक युवा दंपती ने विरासत में मिले पारंपरिक सोने के गहनों को बेचकर करीब 20 लाख रुपए जुटाए। इस राशि का उपयोग उन्होंने नवी मुंबई में अपने पहले घर की डाउन पेमेंट के लिए किया। अधिक डाउन पेमेंट होने से उनकी मासिक होम लोन ईएमआई करीब 20 हजार रुपए कम हो गई। दंपती का मानना है कि वर्षों से लॉकर में रखे गहनों की तुलना में अपना घर उनके लिए अधिक उपयोगी निवेश साबित हुआ।