1 जनवरी 2026,

गुरुवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

मेरी खबर

icon

प्लस

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

अस्पतालों और बीमा कंपनियों में छिड़ी जंग! लाखों बीमाधारकों को अगले महीने से नहीं मिलेगा कैशलेस इलाज

What is Common Empanelment: बीमा नियामक इरडा ने एक 'कॉमन इंपैनलमेंट' (साझा पैनल) का प्रस्ताव रखा है। यह कैशलेस इलाज की प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए है। अस्पतालों का कहना है कि यह प्रस्ताव बीमा कंपनियों के पक्ष में है।

3 min read
Google source verification
Common Empanelment

कॉमन इंपैनलमेंट प्रस्ताव के पक्ष में नहीं हैं हॉस्पिटल्स (PC: Gemini)

स्वास्थ्य बीमा कंपनियों की और से पुराने कॉन्ट्रैक्ट की दरों को बढ़ाने से इनकार और बीमा नियामक इरडा की ओर से सभी अस्पतालों के लिए कॉमन इंपैनलमेंट के प्रस्ताव से बड़े निजी अस्पतालों व हेल्थ इंश्योरेंस कंपनियों में जंग छिड़ी हुई है। देशभर के करीब 15,000 अस्पताल, जिनमें मैक्स हेल्थकेयर और मेदांता शामिल हैं, बजाज एलायंज के पॉलिसीधारकों को अगले महीने से कैशलेस इलाज नहीं देंगे। इससे देश में लाखों बीमा धारकों पर असर पड़ेगा।

मरीजों को अपना बिल खुद चुकाना होगा

एसोसिएशन ऑफ हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स इंडिया (एएचपीआई) ने अपने 15,000 सदस्य अस्पतालों से कहा है कि वे एक सितंबर से बजाज एलायंज के ग्राहकों के लिए कैशलेस इलाज बंद कर दें। यानी मरीजों को अपना बिल खुद चुकाना होगा और बाद में उन्हें बीमा कंपनी से रीइम्बर्समेंट (पैसे की वापसी या बीमा क्लेम) लेना पड़ेगा।

क्यों है तकरार?

अस्पतालों का आरोप है कि बजाज एलायंज ने पुराने कॉन्ट्रैक्ट की दरों को बढ़ाने से इनकार कर दिया है। उल्टा अस्पतालों पर दबाव डाला कि वे और भी कम टैरिफ पर इलाज करें। अस्पतालों ने शिकायत की है कि जब वे इलाज का खर्च बीमा कंपनी को भेजते हैं तो कंपनी बिना चर्चा किए उस रकम में कटौती कर देती है।

आगे क्या होगा?

एएचपीआई ने साफ किया है कि इलाज बंद नहीं होगा। मरीजों का इलाज होगा, लेकिन कैशलेस सुविधा नहीं मिलेगी। इसी तरह का नोटिस 22 अगस्त को केयर हेल्थ इंश्योरेंस को भी भेजा गया है। अगर 31 अगस्त तक मामला नहीं सुलझा तो उनके ग्राहकों के लिए भी कैशलेस सेवा बंद हो सकती है। एएचपीआई ने कहा, भारत में मेडिकल खर्च हर साल करीब 78% बढ़ रहा है। अगर इलाज पुराने रेट पर ही चलता रहा, तो अस्पतालों के लिए क्वालिटी केयर देना मुश्किल हो जाएगा।

कॉमन इंपैनलमेंट पर भी रार

कैशलेस इलाज की प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए बीमा नियामक इरडा ने एक 'कॉमन इंपैनलमेंट' (साझा पैनल) का प्रस्ताव रखा है। हालांकि, इस प्रस्ताव को लेकर पर्दे के पीछे हेल्थ इंश्योरेंस कंपनियों और प्राइवेट अस्पतालों के बीच ठनी हुई है। बीमा कंपनियों का मानना है कि इससे प्रक्रिया आसान होगी, लोगों को ज्यादा अस्पतालों तक पहुंच मिलेगी और प्रीमियम भी कम रखने में मदद मिलेगी। वहीं, कई अस्पताल कहते हैं कि यह फ्रेमवर्क एकतरफा है।

कॉमन इंपैनलमेंट के फायदे

  1. अधिक अस्पतालों में मरीजों के लिए बिना किसी एडवांस पेमेंट के इलाज कराना आसान हो जाएगा।
  2. कोई व्यक्ति चाहे इंश्योरेंस कंपनी बदले या किसी दूसरी कंपनी से टॉप-अप पॉलिसी ले, कॉमन प्लेटफॉर्म से इलाज आसान होगा।
  3. साझा डेटाबेस से लोगों को पता चल सकेगा कि कौन-सा अस्पताल उनकी पॉलिसी के तहत कवर है।
  4. कॉमन इपैनलमेंट के लिए तय मानक होंगे, जिससे सूचीबद्ध अस्पतालों की गुणवत्ता सुनिश्चित होगी।
  5. समान ऑथराइजेशन से क्लेम रिजेक्शन घटेंगे।

अस्पताल क्यों चिंतित?

अस्पतालों का कहना है कि कॉमन इपैनलमेंट एग्रीमेंट का मौजूदा ड्राफ्ट उनसे ठीक से राय मशविरा किए बिना तैयार किया गया है। पैकेज रेट्स, ऑपरेशन से जुड़े नियम और पेमेंट की शर्ते अवास्तविक हैं और बीमा कंपनियों के पक्ष में झुकी हुई हैं। अस्पतालों का कहना है कि बढ़ती मेडिकल महंगाई के बावजूद इलाज की दरों को सालों से अपडेट नहीं किया गया है। इससे उन्हें खर्च में कटौती करनी पड़ती है, जिससे इलाज की क्वालिटी पर असर पड़ सकता है।

छोटे अस्पताल पक्ष में

कॉमन इंपैनलमेंट सिस्टम के मोटे- मोटे आइडिया का अस्पताल पूरी तरह से विरोध नहीं कर रहे हैं। छोटे अस्पतालों को इसमें शामिल होने में फायदा दिख रहा है। इससे उनकी पहुंच बढ़ेगी। पर बड़े प्राइवेट हॉस्पिटल चेन्स स्टैंडर्डाइज्ड प्राइसिंग को लेकर सतर्क हैं, क्योंकि उनकी ऑपरेशनल कॉस्ट अधिक होती है। वे रीइम्बर्समेंट में देरी और क्लेम रिजेक्शन पर बार- बार होने वाले विवादों की भी शिकायत करते हैं।