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EMI बढ़ी, बचत घटी: भारतीय परिवारों का पैसा आखिर कहां जा रहा है?

Household Savings: भारतीय परिवारों की नेट फाइनेंशियल बचत GDP के 7.7 फीसदी से गिरकर 5.2 फीसदी पर आ गई है। कर्ज 44.6 फीसदी सालाना की रफ्तार से बढ़ा है।

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भारत

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Pawan Jayaswal

Apr 14, 2026

Household Savings

कर्ज लेने की रफ्तार तेजी से बढ़ी है। ({C: AI)

Household Savings: पहले भारतीय परिवार पैसा बचाते थे, फिर खर्च करते थे। अब पहले खर्च करते हैं, फिर EMI भरते हैं। यह सिर्फ किसी एक घर की कहानी नहीं है। पूरे देश में यही हो रहा है। Client Associates ने एक रिपोर्ट निकाली है, जिसका नाम "The New Indian Household Balance Sheet" है। यह फर्म 1300 से ज्यादा अमीर और बेहद अमीर परिवारों के 7 अरब डॉलर से ज्यादा के पैसे संभालती है। उनकी रिपोर्ट बताती है कि भारतीय परिवारों के पैसे का हिसाब-किताब बुनियादी तौर पर बदल चुका है। यह बदलाव चौंकाने वाला है।

बचत तो हो रही है, पर हाथ में आ कितनी रही है?

भारत की कुल बचत दर GDP के करीब 30 फीसदी के आसपास है। सुनने में अच्छा लगता है। लेकिन असली मामला "नेट फाइनेंशियल सेविंग्स" का है, यानी वह बचत जो वाकई निवेश के लिए बचती है। यह FY2024 में गिरकर GDP का महज 5.2 फीसदी रह गई है। कोविड से पहले यह 7.7 फीसदी थी। यानी करीब ढाई फीसदी का घाटा। हुआ क्या? कर्ज बढ़ गया है और वह भी तेजी से।

कर्ज की रफ्तार देखकर दिल दहल जाए

कोविड के बाद से घरेलू कर्ज 44.6 फीसदी सालाना की रफ्तार से बढ़ा है। बचत इस दौड़ में कहीं पीछे छूट गई। घरेलू कर्ज अब GDP का 6.2 फीसदी है, जो दस साल का सबसे ऊंचा स्तर है। कोविड से पहले यह 4.1 फीसदी था।

FY2016 से FY2025 के बीच पर्सनल और रिटेल लोन 17.6 फीसदी सालाना की दर से बढ़े। यह GDP की वृद्धि दर से करीब दोगुना है। क्रेडिट कार्ड खर्च तो और भी तेजी से भागा। 25.2 फीसदी सालाना। नौ साल में क्रेडिट कार्ड का हिस्सा कुल रिटेल क्रेडिट में 2.7 फीसदी से बढ़कर 4.8 फीसदी हो गया। होम लोन अभी भी सबसे बड़ा हिस्सा है, जो कुल रिटेल क्रेडिट का 51 फीसदी है। पर्सनल लोन का हिस्सा 21.2 फीसदी से बढ़कर 26.3 फीसदी हो गया है।

प्लॉट और मकान में अटकी बचत

एक और बड़ा बदलाव हुआ है। भारतीय परिवारों की कुल बचत में फिजिकल एसेट यानी जमीन-मकान का हिस्सा अब 70 फीसदी हो गया है। कोविड से पहले यह 58 से 60 फीसदी था। रियल एस्टेट में निवेश FY2024 में GDP का 12.8 फीसदी पर पहुंच गया। अब सोचिए। एक तरफ मकान खरीदने के लिए होम लोन की EMI, दूसरी तरफ क्रेडिट कार्ड का बिल, तीसरी तरफ पर्सनल लोन की किस्त। हाथ में बचता क्या है?

एक अच्छी खबर भी है

म्यूचुअल फंड और शेयर बाजार में भारतीय परिवारों की दिलचस्पी तेजी से बढ़ी है। FY2020 में कुल फाइनेंशियल एसेट में इक्विटी और म्यूचुअल फंड का हिस्सा 4 फीसदी था। FY2025 तक यह 15 फीसदी हो गया। म्यूचुअल फंड का AUM अब GDP का 18.2 फीसदी है। लेकिन अभी भी बहुत लंबा रास्ता बाकी है। अमेरिका में म्यूचुअल फंड AUM GDP का 131.7 फीसदी है। भारत में डीमैट खाते अभी सिर्फ 11 फीसदी आबादी के पास हैं। यानी बाजार में पैसा आना अभी शुरू ही हुआ है।

नई पीढ़ी की सोच अलग है

रिपोर्ट कहती है कि यह कर्ज मजबूरी से नहीं, बल्कि आत्मविश्वास से आ रहा है। युवा पीढ़ी एक साथ बचाना, निवेश करना और कर्ज लेना तीनों काम कर रही है। पुरानी पीढ़ी सिर्फ बचाती थी और कर्ज से दूर भागती थी। रिपोर्ट यह भी चेतावनी देती है कि बिना सोचे-समझे लिया गया कर्ज नकदी का प्रवाह बिगाड़ देता है और जरूरत के वक्त हाथ खाली कर देता है।

आपको क्या करना चाहिए?

  • सिर्फ मकान में पैसा लगाना काफी नहीं। जमीन-जायदाद जल्दी बिकती नहीं और एक ही जगह सब कुछ दांव पर लगाना ठीक नहीं।
  • कर्ज बुरा नहीं है, अगर वह संपत्ति बनाने के लिए लिया गया हो। पर सिर्फ शौक या जीवनशैली के लिए कर्ज लेना खतरनाक है।
  • SIP और इक्विटी जैसे फाइनेंशियल एसेट्स में हिस्सेदारी बढ़ाना अब जरूरत बन गई है, विकल्प नहीं।
  • इमरजेंसी फंड रखना अब "अच्छी बात" नहीं बल्कि "जरूरी काम" है। जितना कर्ज बढ़ेगा, उतना ही आपको लिक्विड पैसे की जरूरत होगी।
  • अंत में, पैसा कितना कमाते हैं यह कम जरूरी है। पैसे के साथ कैसा बर्ताव करते हैं, यह ज्यादा जरूरी है।