
रिटायरमेंट प्लानिंग को लेकर जागरुकता तेजी से बढ़ी है। (PC: AI)
भारत में रिटायरमेंट प्लानिंग को लेकर अवेयरनेस काफी तेजी से बढ़ी है। रियायरमेंट लोगों की सबसे बड़ी वित्तीय प्राथमिकताओं में आ गया है। लेकिन सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि लोग इसके बारे में सोच तो बहुत रहे हैं, लेकिन प्लानिंग नहीं कर रहे। PGIM इंडिया रिटायरमेंट रेडीनेस सर्वे 2025 बताता है कि भविष्य को लेकर चिंता बढ़ने के बावजूद तैयारी पहले से भी कम है।
सर्वे के अनुसार, सिर्फ 37% भारतीयों का कहना है कि उनके पास रिटायरमेंट प्लान है। यह आंकड़ा पिछले वर्षों की तुलना में तेजी से गिरा है। ऐसे लोग काफी कम हैं, जो यह कह सकें कि वे रिटायरमेंट के बाद अपनी लाइफस्टाइल बनाए रख पाएंगे। इरादा और तैयारी के बीच बड़ा अंतर खासतौर पर कामकाजी पेशेवरों में साफ दिखता है, जो रिटायरमेंट को प्राथमिकता तो मानते हैं, लेकिन ठोस कदम बहुत कम उठाते हैं।
परिवार पर निर्भरता अब भी काफी ज्यादा है। करीब 42% लोग रिटायरमेंट के दौरान जीवनसाथी, बच्चों या विस्तारित परिवार पर निर्भर रहने की उम्मीद रखते हैं। यह एक कमजोर प्लानिंग को दर्शाता है। खासकर ऐसे दौर में जब न्यूक्लियर फैमिली, नौकरी में बार-बार बदलाव और बढ़ती आयु आम होती जा रही है। सर्वे बताता है कि जागरूकता तो बढ़ी है, लेकिन योजना पर अमल नहीं हो रहा।
सिर्फ 25% भारतीयों के पास कोई वैकल्पिक आय का स्रोत है। वहीं, केवल 14% लोगों के पास ही रिटायरमेंट प्लान के साथ-साथ वैकल्पिक आय है। यह आंकड़ा पहले 26% था। जिन लोगों के पास किराये, बिजनेस या फाइनेंशियल एसेट्स से साइड इनकम है, वे रिटायरमेंट को लेकर कहीं ज्यादा आश्वस्त हैं। बाकी लोग पूरी तरह उस बचत पर निर्भर हैं, जो शायद भविष्य में जरूरी स्तर तक पहुंच ही न पाए।
फाइनेंशियल एंजायटी अब सिर्फ दिमाग तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह रोजमर्रा के फैसलों में भी दिखाई देती है। पैसों को लेकर ज्यादा तनाव महसूस करने वालों का आंकड़ा 32% से बढ़कर 46% हो गया है।
करीब 67% लोग मानते हैं कि वित्तीय तनाव उनके काम की उत्पादकता को नुकसान पहुंचा रहा है। यह दिखाता है कि घरेलू वित्तीय दबाव अब सीधे अर्थव्यवस्था पर असर डालने लगा है। जो लोग आज के खर्चों को लेकर चिंतित हैं, वे कल की योजना बनाने में सक्षम नहीं रह जाते, भले ही उन्हें पता हो कि ऐसा करना जरूरी है।
लोगों का बजट अब शॉर्ट टर्म जरूरतों की ओर झुक गया है। मासिक खर्च अब आय का 65% हो चुका है, जो पहले 59% था। इसका मतलब है कि लॉन्ग टर्म सेविंग्स के लिए गुंजाइश लगातार घट रही है। ईएमआई और शॉर्ट-टर्म उधारी बढ़ी है, जबकि निवेश और वैकल्पिक बचत पीछे छूट गई है।
यही वजह है कि जागरूकता बढ़ने के बावजूद रिटायरमेंट प्लानिंग कमजोर पड़ रही है। लोग भविष्य की अनदेखी अपनी मर्जी से नहीं कर रहे, बल्कि मौजूदा जरूरतों को प्राथमिकता देने के लिए मजबूर हैं। रिपोर्ट साफ कहती है कि भारत की रिटायरमेंट प्रॉब्लम अब अज्ञानता या लापरवाही की नहीं, बल्कि कैपेसिटी की है। बढ़ती महंगाई, कर्ज का बोझ और वित्तीय तनाव उस अतिरिक्त बचत को खत्म कर रहे हैं, जो भविष्य की योजना बनाने के लिए जरूरी होती है।
Published on:
05 Jan 2026 05:58 pm
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