11 फ़रवरी 2026,

बुधवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

बाबा का जाना यानी छिंदवाड़ा साहित्य जगत के एक युग का अंत

साहित्य जगत के वटवृक्ष हनुमंत मनगटे का निधन

2 min read
Google source verification
chhindwara

chhindwara

छिंदवाड़ा। ख्यातिलब्ध कहानीकार और समांतर कहानी के पुरोधा हनुमंत मनगटे का अल्प बीमारी के बाद रविवार को निधन हो गया।
वरिष्ठ कथाकार हनुमंत मनगटे ने अपने लेखन से छिंदवाड़ा की साहित्यिक परम्परा को आगे बढ़ाया और नई पहचान दी। वे साहित्य की प्रगतिशील परम्परा की मशाल थामकर आगे बढ़े और नई पीढ़ी को प्रगतिशील विचारधारा से जोडऩे में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और शायद इसी वजह से ही छिंदवाड़ा सहित्य जगत उन्हें प्यार से बाबा कहता है। एक जुलाई 1935 को छिंदवाड़ा मध्य प्रदेश में जन्मे हनुमंत मनगटे अपने लेखन में समय की छाप छोड़ते हैं। उनकी रचनाओं में सतपुड़ा की वादियों का यथार्थ है।

उनके कहानी संग्रह:
सामना, फन, गवाह चश्मदीद, पूछो कमलेश्वर से, उपन्यास-समांतर, अंगरा, व्यंग्य संग्रह-शोक चिह्न, कविता संग्रह-उर्वरा है वादियां सतपुड़ा की, मरण पर्व प्रकाशित हैं। वे साठोत्तरी दशक की हिंदी कहानी के एक महत्वपूर्ण कथाकार हैं। उनकी कहानियां सामान्य जन के लिए प्रतिबद्ध और उनकी नियति और सपनों से संबद्ध है। उन्हें मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन का वागीश्वरी पुरस्कार, दुष्यंत कुमार सुदीर्घ साधना सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है। उन्होंने 1978 में कहानी पर केंद्रित समांतर साहित्य सम्मेलन आयोजित किया जो अपने आप में एक मिसाल रहा। वे प्रगतिशील लेखक संघ, भारतीय जन नाट्य मंच और मध्य प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन से गहरे तक जुड़े थे। उनका जाना छिंदवाड़ा साहित्य जगत के एक युग का अंत है।

साहित्य के रास्ते में बहुत फिसलन ह
बाबा ने छिंदवाड़ा के साहित्यकारों को एक परिवार की तरह जोड़ कर रखा। बाबा इस परिवार के सबसे बड़े सदस्य थे और मैं सबसे छोटी। इस नाते उनसे बहुत स्नेह मिला और सीख भी। उन्होंने एक बार कहा था साहित्य के रास्ते में बहुत फिसलन है, यहां अच्छे-अच्छे लोग रास्ता भटक जाया करते हैं। लेखन को एक जिम्मेदारी की तरह लेना चाहिए और जन का पक्षधर होना ही लेखकीय धर्म है। उनकी कमी तो रहेगी, लेकिन उनके विचारों की रोशनी हमेशा रास्ता दिखाती रहेगी।
- शेफ़ाली शर्मा, युवा साहित्यकार

छिंदवाड़ा की साहित्यिक जमीन को उर्वरा बनाने का काम किया
हनुमंत मनगटे का निधन हिंदी साहित्य जगत के लिए एक गहरा सदमा है। छिंदवाड़ा जैसे छोटे शहर में रहकर लेखन करते हुए मनगटे ने पूरे देश में अपनी कहानियों और उपन्यासों के माध्यम से अपनी यश-पताका फहराई है। 1978 में छिंदवाड़ा में उनके द्वारा आयोजित समांतर लेखक सम्मेलन ने जहां एक ओर हिंदी कहानी को एक नया मोड़ दिया वहीं इस सम्मेलन ने छिंदवाड़ा की साहित्यिक जमीन को उर्वरा बनाने का काम किया है। फैंटेसी में कहानी रचना करने में उन्हें महारत हासिल थी। खुश मिजाज मनगटे जहां यारों के यार थे वहीं अपने से छोटों के प्यारे बाबा थे। युवा रचनाकारों के प्रेरणास्रोत का यूं अचानक चले जाना हम सबके लिए एक गहरा आघात है। हिंदी साहित्य जगत में उनके योगदान के लिए हम सदैव उनके ऋणी रहेंगे।
- हेमेंद्र कुमार राय, अध्यक्ष म.प्र. हिंदी साहित्य सम्मेलन एवं म.प्र. प्रगतिशील लेखक संघ छिंदवाड़ा