
नकुलनाथ को ही यहां से बीजेपी का उम्मीदवार बनाए जाने की फिर चर्चा
बीजेपी की पहली सूची में कमलनाथ के गढ़ छिंदवाड़ा को छोडऩे पर सवाल उठने लगे हैं। कहा जा रहा है कि किसी नए चेहरे के इंतजार में भाजपा की टिकट रोकी गई है। राजनीतिक गलियारों में जहां इसके कारणों की खोजबीन की जा रही है, वहीं आमजनों के साथ बीजेपी कार्यकर्ता भी पार्टी के पैंतरे को समझ नहीं पा रहे। खास बात तो यह है कि कमलनाथ के सांसद पुत्र नकुलनाथ को ही यहां से बीजेपी का उम्मीदवार बनाए जाने की फिर चर्चा चल पड़ी है।
भाजपा की पहली टिकट सूची में कमलनाथ के गढ़ छिंदवाड़ा का नाम नहीं आ पाया। इससे टिकट के आधा दर्जन दावेदार फिलहाल निराश हो गए हैं। पार्टी के टिकट होल्ड करने के कारणों की खोजबीन शुरू हो गई है। कहा जा रहा है कि भाजपा नेतृत्व ने कहीं किसी नए चेहरे के इंतजार में तो सीट नहीं छोड़ी है। हर कोई यह जानने का इच्छुक है कि पार्टी छिंदवाड़ा को लेकर क्या रणनीति बना रही है।
भाजपा की देशभर में 195 उम्मीदवारों की घोषणा में मप्र की जिन पांच सीटों को छोड़ा गया है, उनमें छिंदवाड़ा संसदीय क्षेत्र का नाम प्रमुख है। इस सीट से अब तक आधा दर्जन दावेदार पार्टी नेतृत्व के समक्ष दावेदारी
पेशक रचुके हैं। उन्हें खासकर शनिवार की शाम का इंतजार था। जैसे ही टिकट की घोषणा हुई, उनमें छिंदवाड़ा का नाम न पाकर वे मायूस हो गए।
पार्टी कार्यकर्ता भी सीट होल्ड होने के कारण जानने के लिए अपने वरिष्ठ नेताओं से संपर्क करते रहे। पार्टी देर-सबेर उम्मीदवार घोषित करेगी। फिर भी कहीं न कहीं पार्टी नेतृत्व की इस संसदीय सीट को लेकर नजरिया चर्चा का विषय रहा।
नकुलनाथ को ही लेकर आशान्वित तो नहीं: भाजपा की पहली सूची में
छिंदवाड़ा का नाम गायब होने पर राजनीतिक पंडित ये भी मान रहे हैं कि
भाजपा अभी भी नकुलनाथ को लेकर कहीं न कहीं आशान्वित हैं। पिछले एक माह तक देश की राजनीति में कमलनाथ-नकुलनाथ के भाजपा में प्रवेश की अटकलें लग रहीं थीं। हाल ही में सीएम डॉ.मोहन यादव ने एक इंटरव्यू में ये कहकर इस मामले को हवा दी कि नकुलनाथ देर सबेर भाजपा में आएंगे।
हालांकि नकुल ने छिंदवाड़ा दौरे में कांग्रेस में ही रहकर चुनाव लडऩे का बयान दिया है। फिर भी राजनीति में कुछ भी संभव है। इस दृष्टि से लोग कह रहे हैं कि भाजपा शायद उनका इंतजार कर रही है।
एक अपवाद को छोड़कर कांग्रेस की अजेय सीट-
लोकसभा चुनाव में कांग्रेस वर्ष 1951 के पहले चुनाव से ही छिंदवाड़ा सीट जीतते आई है। केवल वर्ष 1997 में सुंदर लाल पटवा ने भाजपा का कमल खिलाया था। यह भी ऐतिहासिक तथ्य है कि वर्ष 1977 में इमरजेंसी के बाद चुनाव में भी छिंदवाड़ा का जनमानस कांग्रेस के साथ था।
विधानसभा चुनाव में भी भाजपा सातों सीट हारी-चार माह पहले नवम्बर में हुए विधानसभा चुनाव में संसदीय सीट
की सातों विधानसभा से भाजपा को हार का सामना करना पड़ा था। पार्टी नेतृत्व की हर रणनीति पर कमलनाथ भारी पड़े। यह भी एक कारण है जिसके लिए भाजपा ने छिंदवाड़ा संसदीय सीट के लिए खास रणनीति बनाई है।
Published on:
03 Mar 2024 02:55 pm
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