
बुंदेलखंड के इस वीर योद्धा को देवी ने दिया था अमरता का वरदान, आज भी करने आते हैं मां की पूजा
चित्रकूट. आस्था और श्रद्धा के सागर में नौ दिनों तक गोता लगाते हुए जगत जननी मां शक्ति की आराधना स्तुति का पावन समय नवरात्रि की पवित्र बेला शुरू हो गई है। भक्त इन नौ दिनों के दौरान शक्तिस्वरूपा के नौ रूपों की आराधना पूजा स्तुति करते हुए जीवन के कल्याण की कामना करते हैं। देश के विभिन्न शक्तिपीठों में भव्य तरीके से जगतजननी की पूजा स्तुति व उनका श्रृंगार किया जाता है। दूर से आने वाले श्रद्धालु इन शक्तिपीठों में मत्था टेकते हुए खुद को धन्य समझते हैं। यूं तो देश में कई प्रसिद्द शक्तिपीठ हैं जिनकी महत्ता किसी परिचय की मोहताज नहीं जैसे उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में स्थित मां विंध्यवासिनी का स्थान, असम में स्थित कामाख्या माता का स्थान आदि। मान्यता है की जिन स्थानों पर माता सती के शरीर के अंग गिरे वे स्थान ही शक्तिपीठ कहलाए और आज भी उन स्थानों पर आम दिनों से लेकर नवरात्रि के नौ दिन आस्थावानों का हुजूम मां के दर्शन पूजन को उमड़ता है। आज तक आपने कई प्रसिद्द देवी मंदिरों शक्तिपीठों उनसे जुड़ी मान्यताओं किवदंतियों पौराणिक उल्लेखों के बारे में सुना होगा उनके विषय में जाना होगा लेकिन आज एक ऐसी प्रसिद्द देवी मां के स्थान के बारे में हम आपको रूबरू कराएंगे बताएंगे जो पूरे देश में अपनी अलग ही पहचान रखता है खासतौर से बुंदेलखंड की आस्था की केंद्र बिंदु हैं। ये शक्तिस्वरूपा और जिन्होंने बुंदेलखंड के एक वीर योद्धा को उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर अमर होने और अपराजय रहने का वरदान दिया। आज भी इस मंदिर में सबसे पहले उन्ही वीर योद्धा के द्वारा माँ की पूजा आराधना की जाती है, ऐसी मान्यता है की जब भोर में मंदिर के कपाट खुलते हैं तो मां की प्रतिमा के समक्ष पहले से फूल और जल अर्पित किया हुआ मिलता है। वैसे तो देश के अधिकांश जगहों से आस्थावान इस पवित्र स्थान पर मत्था टेकते हुए झोली फैलाकर मां से आशीर्वाद मंगते हुए जीवन के कल्याण की कामना करने आते हैं लेकिन बुंदेलखंड के लोगों की अटूट श्रद्धा आस्था और विश्वास कुछ अलग ही है इस मंदिर को लेकर।
नवरात्रि के पावन अवसर पर देश भर में मां शक्तिस्वरूपणी की आराधना स्तुति पूजा पाठ का दौर शुरू हो चुका है और शक्तिपीठों में श्रद्धालुओं का सैलाब मां के दर्शन को आतुर हैं। आज हम आपको बताएंगे बुंदेलखंड के उस वीर योद्धा के बारे में जो मां शक्ति का परम भक्त था और उनके आशीर्वाद से वो योद्धा युद्ध में कभी पराजित नहीं हुआ और जिसे प्राप्त हो गया अमरता का वरदान। बुंदेलखंड के गौरव के रूप में प्रसिद्द उस वीर योद्धा का नाम था "आल्हा" जो इसी क्षेत्र की अधिष्ठात्री देवी मां शारदा के परमं भक्त थे, जिनके पराक्रम की गाथाएं और मां शारदा के प्रति उनकी भक्ति की कहानियां अभी भी बुंदेली जुबां में बड़े ही रौब और भक्तिभाव से कही सुनी और गाई जाती हैं।
कौन थे आल्हा
बुंदेलखंड के चित्रकूटधाम मंडल के तहत आने वाला महोबा जनपद जो जाना जाता है अपने परमवीर योद्धाओं आल्हा और उदल के लिए। आल्हा और उदल सगे भाई थे जो महोबा के राजा परमाल के वीर योद्धा थे। आल्हा बुंदेलखंड परिक्षेत्र में आने वाले मध्य प्रदेश के सतना जनपद में स्थित मैहर नाम के स्थान पर विराजित माँ शारदा के परम भक्त थे. स्थानीय मान्यताओं किवदंतियों और ऐतिहासिक उल्लेखों के मुताबिक आल्हा को माँ शारदा ने युद्ध में विजय के लिए वरदान दिया था और शस्त्र के रूप में उन्हें सांग(लोहे का शस्त्र) प्रदान किया था। बुंदेली ऐतिहासिक तथ्यों व् उल्लेखों के अनुसार दिल्ली के शासक पृथ्वीराज चौहान और आल्हा के बीच 52 बार भीषण युद्ध हुआ लेकिन माँ शारदा की कृपा वरदान और अपने पराक्रम से आल्हा ने सभी 52 युद्धों में विजय प्राप्त की जबकि उनका भाई उदल वीरगति को प्राप्त हुआ।
मां शारदा के परम भक्त आल्हा
माँ शारदा धाम से संबंधित पुजारियों व् स्थानीय किवदंतियों के अनुसार माँ शारदा के परम भक्त आल्हा नित्य प्रति ऊँचे पहाड़ पर स्थित माँ के मंदिर में पूजा आराधना करने जाया करते थे। कहा जाता है की जब तक आल्हा माँ की पूजा नहीं कर लेते तक तक पानी का घूँट भी उनके गले के नीचे नहीं उतरता था। सबसे पहले आल्हा ने इस पवित्र स्थान को खोजा था। ऊँचे पर्वत पर विराजी माँ शारदा उनकी भक्ति से इतनी प्रसन्न हुईं की उन्हें अपराजय और अमरता का वरदान दे दिया। पृथ्वीराज चौहान से अंतिम युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद आल्हा के मन में वैराग्य उत्पन्न हो गया और माँ शारदा द्वारा प्रदान किए गए शस्त्र सांग को उन्होंने मंदिर में ही उसकी नोक टेढ़ी करके रख दिया और माँ की भक्ति में आल्हा लीन हो गए।
आज भी करने आते हैं मां की पूजा
ऐसी मान्यता है की आल्हा को अमरता का वरदान प्राप्त है और आज भी वे सबसे पहले मंदिर में पूजा करने आते हैं. मंदिर के मुख्य पुजारी देवी प्रसाद ने बताया की उनकी चौथी पीढ़ी माँ की सेवा में लगी है। माँ शारदा का स्थान वैसे तो दूर दूर तक प्रसिद्द है लेकिन बुंदेलखंड की आस्था इस मंदिर को लेकर विशेष है। देवी प्रसाद के मुताबिक उन्होंने भी माँ शारदा और आल्हा की भक्ति से संबंधित कई किवदंतियां दंत कथाएं आदि सुनी हैं और कई बार लोगों द्वारा दावा किया गया की माँ की पूजा सबसे पहले कोई आल्हा के द्वारा की जाती है। पुजारी देवी प्रसादं के अनुसार उन्हें लगभग 50 वर्ष हो गए मंदिर में माँ की सेवा करते , इस दौरान एक बार जब उन्होंने मंदिर के कपाट भोर में खोले तो माँ की प्रतिमा के पास पुष्प और जल अर्पित था। यह आश्चर्यजनक दृश्य देखकर उन्हें भी आभाष और विश्वास हो गया की माँ शारदा अजर अमर हैं और कोई उनकी पूजा पहले कर जाता है।
मां सती का गिरा था हार
चित्रकूट से लगभग 70 किलोमीटर दूर मध्य प्रदेश के सतना में स्थित इस स्थान का नाम मैहर पड़ने के पीछे मान्यता है की जब माता सती के शव को लेकर शिव क्रोध में विचरण कर रहे थे तो उन्हें शांत करने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शव को क्षत विक्षत कर दिया और इस दौरान उनके शरीर के अंग इस पृथ्वी पर जहाँ जहाँ गिरे वे स्थान शक्तिपीठ बन गए। मान्यता के मुताबिक मैहर में माता सती का हार गिरा था और तभी से इसे मैहर के नाम से जाना जाने लगा। किसी शक्तिपीठ से कम महत्ता नहीं मैहर की। माँ शारदा की मूर्ति की स्थापना विक्रम सम्वत 559 में मानी जाती है। मूर्ति पर देवनागिरी लिपि में शिलालेख भी अंकित है।
बुंदेलखंड के वीर योद्धा आल्हा द्वारा मां शारदा की भक्ति की गाथा नवरात्रि के दिनों में बड़े ही श्रद्धा से गए जाती है। जब भी आप मैहर जाएंगे आपको आल्हा गायन के विभिन्न ऑडियो वीडियो सुनने को जरूर मिलेंगे। बुंदेलखंड के इस वीर योद्धा की परम भक्ति आज भी इस क्षेत्र की पहचान है।
Published on:
21 Sept 2017 02:05 pm
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