
परिवार संग गोरान्वी, इनसेट में गोरान्वी और शान्वी, पत्रिका फोटो
World Thalassemia Day: जब नियति ने 5 साल की मासूम गोरान्वी की मुस्कान छीननी चाही, तो उसकी महज 2 साल की छोटी बहन शान्वी जीवनदाता बनकर सामने आई। विश्व थैलेसीमिया दिवस पर यह कहानी किसी चमत्कार से कम नहीं है। निम्बाहेड़ा की नन्हीं गोरान्वी ने अपनी छोटी बहन के बोनमैरो और चिकित्सकों के कौशल से इस जानलेवा बीमारी को मात दे दी है। अब वह दिन दूर नहीं जब यह मासूम हाथों में स्कूल बैग थामकर सुनहरे भविष्य की ओर कदम बढ़ाएगी।
गोरान्वी के पिता हिम्मत कुमार सुथार ने अपनी लाडली को बचाने के लिए जमीन-आसमान एक कर दिया था। परिवार में किसी का एचएलए मैच नहीं होने पर चिंता की लकीरें गहरी थीं, लेकिन सोशल मीडिया के जरिए अरिहंत हॉस्पिटल के कैंप की जानकारी मिली। वहां समर्पण फाउंडेशन के सानिध्य में छोटी बहन शान्वी का टेस्ट हुआ, तो कुदरत का करिश्मा देखिए दोनों बहनों का बोनमैरो 100 प्रतिशत मैच हो गया।
जयपुर के महात्मा गांधी अस्पताल में डॉ. प्रिया मारवा और उनकी टीम की देखरेख में जनवरी 2025 से उपचार शुरू हुआ। 8 अप्रेल 2025 को बोनमैरो ट्रांसप्लांट किया गया, जो पूरी तरह सफल रहा। करीब 10 माह तक चले उपचार के बाद अक्टूबर में उसे अस्पताल से छुट्टी मिल गई। वर्तमान में गोरान्वी स्वस्थ है और आगामी जून में वैक्सीनेशन पूरा होते ही वह पहली बार स्कूल की दहलीज पर कदम रखेगी। थैलेसीमिया से जंग जीत अब गोरान्वी स्कूल जाने को तैयार है वहीं चिकित्सा विज्ञान और अपनों के हौसले की सुखद दास्तां इस जानलेवा बीमारी से पीड़ितों का हौसला बढ़ाएगी।
इस लंबी और खर्चीली जंग में आयुष्मान भारत योजना और साउथ ईस्ट एशिया थैलेसीमिया सोसायटी ने आर्थिक संबल प्रदान किया। वहीं, समर्पण फाउंडेशन भीलवाड़ा ने पूरे सफर में निशुल्क मार्गदर्शन देकर परिवार का हौसला टूटने नहीं दिया।
थैलेसीमिया एक दुर्लभ रक्त विकार है, जिसमें मरीज को आजीवन दूसरों के रक्त पर निर्भर रहना पड़ता है। लेकिन गोरान्वी की कहानी सिखाती है कि यदि सही समय पर जांच (HLA टेस्ट) और बोनमैरो प्रत्यारोपण हो जाए, तो इस बीमारी को जड़ से खत्म किया जा सकता है।
Published on:
08 May 2026 10:23 am
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