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900 ग्राम वजन की नन्ही जिंदगी ने जीती जंग, अविकसित फेफड़े और ना जाने क्या-क्या, अब मां-बच्ची दोनों स्वस्थ

Premature Baby Survival Story: गर्भ के 7वें महीने में बालिका का जन्म, वह भी महज 900 ग्राम वजन। इसके अलावा अविकसित फेफड़े, पैर की उंगली में गैंग्रीन, संक्रमण और हृदय में पेटेंट जैसी कई बीमारियों का आक्रमण..।

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अस्पताल में अब मां-बच्ची दोनों स्वस्थ, पत्रिका फोटो

अस्पताल में अब मां-बच्ची दोनों स्वस्थ, पत्रिका फोटो

Premature Baby Survival Story: गर्भ के 7वें महीने में बालिका का जन्म, वह भी महज 900 ग्राम वजन। इसके अलावा अविकसित फेफड़े, पैर की उंगली में गैंग्रीन, संक्रमण और हृदय में पेटेंट जैसी कई बीमारियों का आक्रमण..। बालिका को जन्म देने वाली मां और परिजन की आंखों से आंसू थम नहीं रहे थे। इलाज के नाम पर अस्पताल प्रबंधन ने जो खर्च बताया, धडक़नें बढ़ गईं।

तत्काल चित्तौड़गढ़ के राजकीय अस्पताल में इलाज का फैसला आज पूरे परिवार के लिए अपार खुशियां ले आया। 55 दिन चले इलाज के बाद बालिका को अस्पताल से डिस्चार्ज किया, जिसका वजन अब 1650 ग्राम है। बालिका स्वस्थ हालत में 14 अप्रेल को अस्पताल से डिस्चार्ज हुई।

19 फरवरी को जन्मी थी बालिका

गर्भवती महिला के पेट में दर्द और कुछ परेशानी पर परिजन उसे 19 फरवरी 2026 को उदयपुर के निजी चिकित्सालय ले गए। डॉक्टरों ने जांच कर गर्भ के सातवें महीने में ही ऑपरेशन करना उचित बताया। सीजेरियन डिलेवरी में मां ने एक बच्ची को जन्म दिया। प्रीमेच्योर डिलेवरी में जन्मी बालिका का वजन केवल 900 ग्राम और साथ में कई बीमारियां अलग।

अति-गंभीर थी बालिका

राजकीय महिला एवं बाल चिकित्सालय प्रभारी डॉक्टर जय सिंह ने बताया कि अति-गंभीर हालत में बालिका को 26 फरवरी को लाया गया। जांच कर उसे एसएनसीयू में रख एनआइसीयू केयर दी गई। डॉक्टर के अनुसार भर्ती करने के दौरान बालिका का वजन 900 ग्राम, उसके बायें पांव की पांचवी उंगली में गैंग्रीन, एस्फीक्सिया, पीलिया, फेफड़ों का विकास पूरा नहीं होने से श्वास लेने में परेशानी, संक्रमण, हृदय में पेटेंट, आर्टियोसस जैसी बीमारी से ग्रसित थी।

परिजन की रजामंदी पर उपचार

गंभीर हालत में होने से अस्पताल प्रबंधन ने बालिका की मां और परिजन से अप्रिय स्थिति में होने वाली घटना के बारे में बताया और उनसे इलाज की रजामंदी ली। इसके बाद उपचार शुरू हुआ तो 55 दिन में बालिका को स्वस्थ कर दिया। इस दौरान एसएनसीयू यूनिट से बाहर लाने पर न्यूट्रिशन का चैलेंज रहा। शुरू में ओजी ट्यूब से मां का दूध फिर सीधे तौर पर दिए जाने से बालिका की हालत में सुधार आया।

ऐसे हुआ उपचार

चिकित्सालय में भर्ती करने के साथ ही बालिका को रेस्पिरेट्री एवं आयनोट्रोपिक सपोर्ट के साथ एंटीबायोटिक पर रखा गया। एनआइसीयू केयर दी गई। स्टाफ की सटीक नर्सिंग केयर, बालिका की मां का पूर्ण सहयोग एवं परिजनों का एसएनसीयू में दृढ़ विश्वास ही इस सफलता का बड़ा कारण रहा।

इनका रहा योगदान

बालिका को नवजीवन देने में महिला एवं बाल चिकित्सालय के नर्सिंग प्रभारी दिनेश सैनी, शाहिद हुसैन, दीपिका, अंजलि, निर्मला, बसंती, सिम्मी, फिदाहुल मुस्तफा, अंतिमबाला, अभिषेक, शांति एवं किरण का पूर्ण योगदान रहा।

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