
बाल विवाह में चित्तौड़गढ़ पहले नंबर पर (फोटो- पत्रिका)
Rajasthan Bal Vivah: चित्तौड़गढ़: राजस्थान में बाल विवाह की दर चिंताजनक है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएचएफएस)-5 के चौंकाने वाले आंकड़ों के अनुसार, राज्य के 22 जिले ऐसे हैं, जहां बाल विवाह का प्रचलन राष्ट्रीय औसत 23.3 प्रतिशत से काफी अधिक है।
केंद्र सरकार के जारी एक हालिया पत्र में इन जिलों को हाई-रिस्क श्रेणी में रखा है और बाल विवाह मुक्त भारत (बीवीएमबी) अभियान के तहत विशेष फोकस देने का फैसला किया है। सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार, राजस्थान में चित्तौड़गढ़ जिला पहले नंबर पर है। वहीं, पड़ोसी जिला भीलवाड़ा दूसरे नंबर पर है।
एनएचएफएस-5 के आंकड़ों के अनुसार, बाल विवाह में चित्तौड़गढ़ में राज्य में सबसे अधिक 42.6 प्रतिशत की दर दर्ज की है। भीलवाड़ा में यह दर 41.8 प्रतिशत है। झालावाड़ और टोंक में क्रमश: 37.8 प्रतिशत और 37.2 प्रतिशत दरें हैं। सवाई माधोपुर 35.4 प्रतिशत और बूंदी 34.1 प्रतिशत में भी हर तीसरी महिला की शादी 18 साल से पहले हुई है।
अन्य प्रमुख हाई-रिस्क जिलों में भरतपुर, करौली, बीकानेर, अलवर, प्रतापगढ़, धौलपुर, जैसलमेर, नागौर, जोधपुर, चूरू, राजसमंद, बारां, दौसा और बांसवाड़ा शामिल हैं। इन जिलों में बाल विवाह का प्रसार 25.0 प्रतिशत से 33.5 प्रतिशत के बीच है, जो राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक है।
महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अवर सचिव अनिल मलिक के 20 नवंबर को जारी पत्र में हाई-रिस्क जिलों को अभियान के लिए विशेष वित्तीय सहायता देने की घोषणा की है। प्रत्येक हाई-रिस्क जिले को 75 लाख रुपए का बजट आवंटित किया जाएगा।
यह राशि ’बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ योजना के बजट शीर्ष से प्रदान की जाएगी। अभियान की विशेष अवधि के दौरान खर्च होने पर 2 लाख का अतिरिक्त फंड भी दिया जाएगा। इसका उद्देश्य कलक्टरों को प्रभावी जागरुकता अभियान चलाने के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराना है।
यह राष्ट्रव्यापी अभियान 27 नवंबर से शुरू होगा। प्रथम चरण 27 नवंबर से 31 दिसंबर तक इस चरण में स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों जैसे शैक्षणिक संस्थानों पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। द्वितीय चरण 1 से 31 जनवरी, 2026 तक रहेगा।
इस चरण में टेंट वाले, कैटरर्स, धर्मगुरु और विवाह स्थल मालिकों से बाल विवाह न कराने के संबंध में शपथ पत्र लिए जाएंगे और विवाह सीजन में कड़ी निगरानी रखी जाएगी। तृतीय चरण 7 फरवरी से 8 मार्च तक रहेगा। इसमें ग्राम/वार्ड सभाएं आयोजित की जाएंगी। समुदाय के सदस्यों को अपने क्षेत्र को बाल विवाह मुक्त घोषित करने का संकल्प लेना होगा।
यह दृष्टिकोण कानून को किताबों से निकालकर जमीन पर प्रभावी रूप से लागू करने की अनिवार्यता को रेखांकित करता है। इसका उद्देश्य बाल संरक्षण तंत्र को अभूतपूर्व तरीके से मजबूत करना है। जब कानून का क्रियान्वयन सुनिश्चित होता है तो ’बचपन’ अपने नैसर्गिक रूप में उभरता है। यह बोझ नहीं, बल्कि एक अनमोल अवसर बन जाता है। सबसे महत्वपूर्ण बात, यह लड़कियों की सामाजिक स्थिति को मौलिक रूप से बदल देगा।
-सुमन त्रिवेदी, पूर्व अध्यक्ष, बाल कल्याण समिति, भीलवाड़ा
Updated on:
26 Nov 2025 02:55 pm
Published on:
26 Nov 2025 02:06 pm
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