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World Art Day: दादा,पिता और पौत्र मंच पर रचते स्वांग, 3 पीढ़ियों की मेहनत से बहरूपिया कला जिंदा

Inspiring Artist Family Story: डिजिटल युग में जहां मल्टीप्लेक्स मनोरंजन की पसंद बनते जा रहे हैं, प्राचीन कला को जिंदा रखने के लिए कई पुराने कलाकार उम्मीद पर जिंदा हैं। इनका मानना है कि फिर से पुराना जमाना लौटेगा।

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दादा-पिता और पौत्र रचते हैं मंच पर स्वांग, पत्रिका फोटो

दादा-पिता और पौत्र रचते हैं मंच पर स्वांग, पत्रिका फोटो

Inspiring Artist Family Story: डिजिटल युग में जहां मल्टीप्लेक्स मनोरंजन की पसंद बनते जा रहे हैं, प्राचीन कला को जिंदा रखने के लिए कई पुराने कलाकार उम्मीद पर जिंदा हैं। इनका मानना है कि फिर से पुराना जमाना लौटेगा। ऐसा ही एक मामला चित्तौड़गढ़ जिले का है, जहां तीन पीढ़ियां मंच पर एक साथ स्वांग रचाती हैं। दादा, पिता और पौत्र बहरूपिया कला को जिंदा रखे हुए हैं।

किसी जमाने में बहरूपिया कला हमारे देश में कला के क्षेत्र में पहचान रखती थी। एक ही कलाकार अलग-अलग रूप-भेष में अपनी कला के प्रदर्शन से लोगों का मनोरंजन करता था। विलुप्त होती इस कला को जिवित रखने की जिम्मेदारी बारू गांव का परिवार निभा रहा है। इस परिवार के लोग 3 पीढ़ियों से बहरूपिया कला को राज्य सहित राष्ट्रीय मंच पर प्रदर्शित कर रहे हैं।

तीन ​पीढ़ियों से परंपरा

जिले के राशमी क्षेत्र के बारू गांव निवासी अंतर्राष्ट्रीय बहरूपिया कलाकार छगनलाल भांड के परिवार में तीन पीढ़ियां एक साथ काम कर रही हैं। छगनलाल भांड उनके बेटे दुर्गाशंकर व उनके पौत्र विक्रम भांड, रविकांत व सूरज भांड मंच पर विभिन्न रुप धर कर कला का प्रदर्शन कर रहे हैं। विक्रम ने बताया कि उनके दादा छगनलाल भांड 84 वर्ष के है।

करीब 70-75 वर्षों से बहरुपिया कला से जुड़े हुए हैं। यह कला उनके परिवार को विरासत में मिली है। चित्तौड़गढ़ के छोटे से बारू गांव से शुरू हुई यह यात्रा आज पूरे भारत और विश्व में भांड कला का परचम लहरा रही है। यह केवल एक कलाकार की कहानी नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति की शक्ति संघर्ष और निरंतरता का जीवंत उदाहरण है।

यह किरदार रहता है चर्चा में

भांड परिवार विलुप्त होती इस कला को जिंदा रखने के लिए यूं तो कई किरदार में लोगों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। लेकिन उनमें सबसे ज्यादा पसंद किए जाने वाले किरदार महिला भेष में गाडोलिया लोहार, फकीर, पठान, ईरानी, भोपाजी, नारद मुनि, भोलेनाथ, सेठ जी, लैला-मजनू, हनुमान आदि हैं।

यह कलाकार राजस्थान के अलावा दिल्ली, मध्य प्रदेश, गुजरात, हरियाणा, गोवा, महाराष्ट्र, चेन्नई, तमिलनाडु, हैदराबाद आदि राज्यों में भी अपनी कला का प्रदर्शन कर सराहना एवं पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं। कलाकार विक्रम भांड ने बताया कि डिजीटल युग में उन्होने भी अपनी कला में बदलाव किया है। किरदारों में चर्चित फिल्मों व टीवी नाटकों के किरदारों को वह अपनाते हैं, जिससे लोग उन्हे पसंद करते हैं।

नई पीढ़ी दे रही नई दिशा

विशेष रूप से युवा कलाकार विक्रम भांड ने इस पारंपरिक कला को आधुनिक मंचों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने सडक़ से स्टेज और स्थानीय से राष्ट्रीय स्तर तक इस कला को पहुंचाकर इसे नई पहचान दी है। विक्रम ने बताया कि उनके दादाजी को कई राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। उनके पिता व उन्हे भी कई मंचों से नवाजा गया है।

मेकअप में लगते हैं दो घंटे

विभिन्न तरह के रूप बनाने के लिए चेहरे पर मेकअप करना जरूरी होता है। उस मेकअप में दो से तीन घंटे लग जाते हैं, तब जाकर रूप निखर के आता है।

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