
चिलम का संग्रह कर कोहिनूर वल्र्ड बुक रिकॉर्ड से पुरस्कृत हुए अग्रवाल
सादुलपुर.
जरूरी नहीं दोस्ती किसी इंसान से ही हो। कोई प्रकृति से, तो कोई जीव-जंतुओं से तो कोई अपने शौक से दोस्ती कर लेता है। शौक इंसान को उसके अंदर-बाहर के दुखों से न केवल कुछ पल के लिए दूर ले जाता है, बल्कि उसे सुखद अनुभव भी कराता है। शीतला बाजार में रहने वाले श्यामसुंदर अग्रवाल को कुछ साल पहले चिलम एकत्र करने का शौक लगा। इसके बाद वे पीछे मुड़कर नहीं देखे। चिलमों के संग्रह में जुट गए और आज उनके पास दो हजार से अधिक विभिन्न प्रकार की चिलमें हैं। जिसकी कीमत लगभग दो लाख रुपए से भी अधिक बताई जा रही है। इस संग्रह पर उन्हे कोहिनूर वल्र्ड बुक रिकॉर्ड से पुरस्कृत किया गया। अग्रवाल के संग्रह में लगभग दो हजार से भी अधिक चिलमों का संग्रह है। जो संभवत: राजस्थान में किसी के पास नहीं है। अग्रवाल ने वर्षों की मेहनत के बाद अपना रहस्य सबसे पहले राजस्थान पत्रिका को बताया है। अग्रवाल का कहना है कि उनका लक्ष्य पूरा होने के बाद ही सार्वजनिक किया है।
ये हैं संग्रह
अग्रवाल के पास भगवान शिव, गणेश, गुरुनानक, बुद्ध, सांप, ओम के नाम की चिलम के साथ चांदी, पीतल, पत्थर, मिट्टी, हाथी दांत, लकड़ी, मेटल आदि चिलमें शामिल हैं। इसके अलावा एक इंच की चीलम भी उनके संग्रह में शामिल है। अग्रवाल ने अपने घर के बने कमरे को एक संग्रहालय का रूप दे रखा है।
चिलम का सदियों पुराना है इतिहास
अग्रवाल का कहना है कि चिलम का वैसे तो सदियों पुराना इतिहास है। लेकिन राजस्थान में यह मान-सम्मान का प्रतीक भी है। चिलम का उपयोग राजा-महाराजओं एवं साधु-संतों तक ही सीमित था तथा चिलम का उपयोग करने के लिए कुछ शिष्टाचार, नियम एवं परंपराएं भी हैं। वे निश्चित रूप से अनिवार्य नहीं है। लेकिन चिलम पीने वाले अनुभवी धुम्रपान करने वाले लोग चिलम का सम्मान और उपयोग करते हैं। उन्होंने बताया कि चिलम का उपयोग देश में तंबाकू की शुरुआत से पहले था एवं धुम्रपान, अफीम, अन्य नशीली पदार्थों के लिए चिलम का उपयोग होता था। विशेषकर देश के ग्रामीण क्षेत्रों में चिलम का उपयोग होता है।
परिवारजन भी देने लगे सहयोग
अग्रवाल के इस शौक को पूरा करने के लिए परिवारजनों सहित मित्र इंद्रकुमार नरवासी एवं मोहम्मद यूनस राजगढ़ ने भी भूमिका निभाई है। इसके अलावा इनके पुत्र कमल ने पूरा साथ दिया है। नया चिलम का कलेक्शन खरीदने के लिए कई गुना कीमत देकर भी खरीदा है एवं जहां भी घूमने जाते हैं, उनका पहला लक्ष्य चिलम के संग्र्रह को ढंूढना होता है।
इसके अलावा शहर के प्रवासी लोगों एवं विदेश में रहने वाले लोगों से लगातार संपर्क में रहकर अपना लक्ष्य पूरा किया है। श्यामसुंदर अग्रवाल ने बताया कि दो हजार के लगभग = चिलम का संग्रह राजस्थान में भी नहीं है। क्योंकि चिलम
का संग्रह करने वालों से वह संपर्क में भी हैं। गिनीज बुक में रिकॉर्ड दर्ज करवाने के लिए प्रयासरत हूं।
साधु से मिली प्रेरणा
अग्रवाल का कहना है कि लगभग ३८ वर्ष पहले उसकी दुकान पर एक साधु आया। जिसके पास एक अनोखी चिलम थी तथा साधु से चिलम की जानकारी प्राप्त की। इसके बाद चिलम के संग्रह का जुनून सवार हो गया। लगभग ३८ साल में उन्होंने दो हजार से अधिक विभिन्न प्रकार की चिलम का संग्रह किया है। इसके लिए अग्रवाल को कोहिनूर वल्र्ड बुक की ओर से पुरस्कृत किया गया और कोहिनूर वल्र्ड बुक रिकॉर्ड में भी दर्ज किया गया है। अग्रवाल का कहना है कि उनका लक्ष्य गिनीज बुक में रिकॉर्ड दर्ज करवाना है।
Published on:
24 Dec 2018 11:33 am
