
ताल छापर स्थित नमक इकाइयों की फाइल फोटो: पत्रिका
चूरू जिले के तालछापर का नाम सुनते ही आंखों के सामने काले हिरणों की दौड़ती तस्वीर उभर आती है, लेकिन इस धरती की पहचान केवल वन्यजीवों तक सीमित नहीं है। कभी यहां का नमक भी पूरे देश में अपनी अलग साख रखता था। यह देश की इकलौती ऐसी जगह मानी जाती है, जहां जमीन से निकलने वाले खारे पानी से नमक बनाया जाता है।
मैग्नीशियम से भरपूर इस नमक की गुणवत्ता इतनी खास थी कि देशभर के कई राज्यों में इसकी भारी मांग रहती थी। मगर वक्त के साथ सरकारी नीतियां बदलीं और कभी हजारों परिवारों का पेट पालने वाला यह उद्योग अब सिमटकर संघर्ष की कहानी बन गया है। क्षेत्र के लोग कहते हैं कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों को बढ़ावा देने और नियमों में बदलाव के कारण तालछापर का पारंपरिक नमक उद्योग धीरे-धीरे दम तोड़ता चला गया।
नमक उद्योग से जुड़े लोगों ने बताया कि तालछापर में वर्ष 1960 से नमक उत्पादन शुरू हुआ था। शुरुआत में यह क्षेत्र वन विभाग के अधीन था, लेकिन 1962 में सरकार ने इसे उद्योग क्षेत्र घोषित कर नमक विभाग को सौंप दिया। उस दौर में करीब 2 हजार एकड़ क्षेत्र में 40 इकाइयां संचालित होती थीं और सालाना लगभग 8 लाख टन नमक उत्पादन होता था। कभी इस उद्योग से करीब 10 हजार मजदूरों और उनके परिवारों की रोजी-रोटी चलती थी। मगर वर्ष 2010 में सरकार ने 1300 एकड़ भूमि का पुन: अधिग्रहण कर उसे वन विभाग को सौंप दिया। इसके बाद उद्योग तेजी से सिमटता चला गया। वर्तमान में केवल 1079.68 एकड़ में करीब 25 इकाइयां संचालित हैं और उत्पादन घटकर करीब 3 लाख टन सालाना रह गया है। वहीं मजदूरों की संख्या भी घटकर महज 500 तक रह गई है।
तालछापर के नमक की सबसे बड़ी विशेषता इसमें मौजूद मैग्नीशियम है। यही वजह है कि इस नमक में नमी लंबे समय तक बनी रहती है। इसी गुण के कारण इसका उपयोग पशु आहार, केमिकल उद्योग और पानीपत के कपड़ा उद्योग में डाइंग कार्य के लिए बड़े पैमाने पर किया जाता रहा है। हालांकि फ्री-फ्लो और आयोडीन युक्त नमक की नीति लागू होने के बाद इस नमक की मांग घटती चली गई। विशेषज्ञ बताते हैं कि मैग्नीशियम अधिक होने के कारण इसमें आयोडीन मिलाना संभव नहीं होता, जिससे बाजार में इसकी प्रतिस्पर्धा कमजोर पड़ गई। एक समय ऐसा था जब यूपी, बिहार, बंगाल, दिल्ली और पूर्वोत्तर राज्यों तक तालछापर का नमक पहुंचता था, लेकिन अब इसकी सप्लाई मुख्य रूप से जयपुर और हरियाणा तक सीमित होकर रह गई है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि उद्योग पर संकट बढ़ने का एक बड़ा कारण परिवहन व्यवस्था भी रही है। पहले उत्पादन के अनुसार छोटे स्तर पर रेल वैगनों में नमक अन्य राज्यों तक भेजा जाता था। लेकिन ब्रॉड गेज लाइन आने के बाद रेलवे की एक साथ 40 वैगन भरने की शर्त ने छोटे उद्योगों के लिए मुश्किलें खड़ी कर दीं। अब कच्चा माल ट्रकों के जरिए जयपुर और आसपास के इलाकों में भिजवाया जाता है जो इकाइयों को महंगा पड़ता है।
जिला उद्योग के महाप्रबंधक नानू राम का कहना है कि पहले लवण श्रमिकों के लिए बीमा योजना जैसी सुविधाएं मिलती थीं। मजदूरों को लंबे बूट, मास्क, चश्मे और साइकिलें तक उपलब्ध करवाई जाती थीं, लेकिन अब अधिकांश सुविधाएं बंद हो चुकी हैं। उन्होंने आगे बताया कि जिन इकाइयों ने सोलर ऊर्जा और सब्सिडी संबंधी आवेदन किए हैं, उनके प्रस्ताव सरकार को भेजे गए हैं, ताकि उद्योग को फिर गति मिल सके।
कभी राजस्थान की अर्थव्यवस्था और हजारों परिवारों की जिंदगी में मिठास घोलने वाला तालछापर का नमक उद्योग आज सरकारी संरक्षण और नई नीतियों की उम्मीद में है। क्षेत्र के लोगों का मानना है कि यदि इस पारंपरिक उद्योग को फिर से प्रोत्साहन मिले तो तालछापर की पहचान केवल काले हिरणों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि ‘सफेद सोने’ की चमक भी देशभर में फिर बिखरेगी।
Updated on:
27 May 2026 11:31 am
Published on:
27 May 2026 11:21 am
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