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शहादत को सलाम: घायल होकर भी दुश्मन पर शेर की तरह टूटे, मां भारती का जयघोष करते हुए शहीद

Shahadat Ko Salam :बात 1999 की है, उस समय जम्मू कश्मीर की पहाडि़यों में आतंकी घुस आए। देश के जवानों ने आतंकियों को खदेड़ दिया। इस ऑपरेशन में चूरू जिले के गांव दूधवाखारा के भारतीय सेना के जवान सूबेदार सुमेर सिंह राठौड़ भी शामिल थे।

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चूरू

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kamlesh sharma

Jan 14, 2026

चूरू। बात 1999 की है, उस समय जम्मू कश्मीर की पहाडि़यों में आतंकी घुस आए। देश के जवानों ने आतंकियों को खदेड़ दिया। इस ऑपरेशन में चूरू जिले के गांव दूधवाखारा के भारतीय सेना के जवान सूबेदार सुमेर सिंह राठौड़ भी शामिल थे। उन्होंने करगिल की पहाड़ियों पर तिरंगा लहराते हुए अपने प्राण देश के लिए न्योछावर कर दिए। यह कहानी बताते हुए शहीद राठौड़ के परिजन अब भी भावुक हो जाते हैं। 3 मई 1999 को पाक से युद्ध की शुरुआत हुई थी, इसका अंत भारतीय सेना ने 26 जुलाई को तिरंगा फहराकर किया।

आज भी राठौड़ की शहादत की कहानी चूरू जिले के जर्रे-जर्रे में है। 15 अगस्त 1955 को चूरू के दूधवाखारा में डूंगरसिंह राठौड़ के घर जन्मे सुमेर सिंह की पढ़ाई के साथ खेलों से काफी जुड़ाव था। गांव की ही स्कूल में उच्च माध्यमिक तक पढ़ाई की। 1971 में जब भारत-पाक युद्ध चल रहा था तब रेडियो पर वीर जवानों के किस्से सुनकर अत्यधिक प्रभावित हुए और सेना में जाने की ठान ली। इसके बाद सुमेर सिंह 26 अप्रेल 1975 को 2 राजपुताना राइफल्स में भर्ती हो गए। दूधवाखारा में सरकारी स्कूल, मंदिर है और पार्क भी शहीद सुमेरसिंह के नाम पर है।

15 हजार फीट की ऊंचाई पर लहराया तिरंगा

ऑपरेशन विजय के दौरान सुमेर सिंह की पोस्टिंग करगिल में थी। पाक घुसपैठियों ने करगिल में चौकियों पर कब्जा कर लिया था। यहीं पर बर्फ के रेगिस्तान कहे जाने वाले 15 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित तेलोलिंग पहाड़ी पर पहुंचना और फिर दुश्मनों से लोहा लेना कठिन चुनौती थी। जहां का पारा जमाव पर हो वहां भी भारत के जवानों की टुकड़ी का नेतृत्व कर रहे सुमेर सिंह ने पाक घुसपैठियों के इरादों को मिट्टी में मिला दिया।

13 जून 1999 को घात लगाए बैठे घुसपैठियों ने छुपकर फायरिंग शुरू कर दी, उसमें सुमेर घायल हो गए। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और शेर की तरह दुश्मनों पर टूट पड़े। घायल होकर भी जवान ने कई दुश्मनों को ढेर कर दिया और चौकी को मुक्त करवा तिरंगा फहरा दिया, लेकिन वे भारत माता का जयघोष करते हुए शहीद हो गए। 17 जून 1999 को शहीद सुमेरसिंह के पैतृक गांव दुधवाखारा में उनका राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया।

आखिरी पाती में लिखा, बेटे की शादी धूमधाम से करना

शहीद सूबेदार के बेटे नरेंद्र सिंह के अनुसार उनकी शादी पिता ने बचपन में तय कर दी थी। शहीद सूबेदार सुमेर सिंह की पुत्रवधू भी सैनिक की बेटी हैं। शहीद सूबेदार सुमेर सिंह ने ड्यूटी के दौरान दोस्त हवलदार भरतसिंह शेखावत के बेटे के साथ बेटी की शादी तय कर दोस्ती को रिश्तेदारी में बदल दिया, लेकिन वे अपनी बेटी की तय शादी नहीं कर पाए, जिन्होंने अपने आखरी पत्र में वीरांगना को लिखा कि बेटी की शादी धूमधाम से करना।

मिला सेना मेडल

सुबेदार सुमेर सिंह को उनकी असाधारण वीरता, अदम्य साहस और सर्वोच्च बलिदान के लिए सेना मेडल से सम्मानित किया। इनके बड़े पुत्र नरेन्द्र राठौड़ चूरू उपखण्ड कार्यालय में कार्यरत हैं। वीरांगना कमलादेवी घर संभाले हुए है। छोटा बेटा हिम्मत सिंह जयपुर में पेट्रोल पंप संचालन में जुटा है। बेटी अनिता ससुराल पिलानी में रह रही है।

पत्रिका कार्यालय में किया सम्मान

राजस्थान पत्रिका के शहादत को सम्मान अभियान के तहत चूरू पत्रिका कार्यालय में मंगलवार को शहीद परिवार का सम्मान किया गया। कार्यक्रम में एलएन मेमोरियल ट्रस्ट के प्रबंध निदेशक डॉ.महेश शर्मा ने शहीद सुमेर सिंह राठौड़ की पुत्रवधू बेबी कंवर और पुत्र नरेन्द्र सिंह राठौड़ का सम्मान किया। इस दौरान नोरंग खोज भी मौजूद रहे।