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चूरू.
हर पिता की ख्वाहिश होती है कि उसकी पहचान उसकी औलाद के नाम से हो। अपनी ये ख्वाहिश पूरी करने के लिए हर पिता दिन-रात न केवल जी तोड़ मेहनत करता है। बल्कि अपनी जरूरतों को सीमित कर जेब से पैसा बचाकर बच्चों की जरूरतें पूरी करता है। बच्चों की खुशी के लिए संघर्ष के इस दौर में किसी के आगे हाथ फैलाने से भी गुरेज नहीं करता। बच्चे भी अपने पिता के इस त्याग की कीमत समझते हुए अपनी प्रतिभा के दम पर आगे बढ़े हैं। जिस पर आज न केवल उनके पिता, बल्कि पूरे जिले को गर्वहै। फादर्स डे के मौके पर पत्रिका ने जुटाई कठिन संघर्ष के दम पर अपने बच्चों को सफलता की बुलंदियों तक पहुंचाने वालों की छोटी-छोटी कहानियां।
फीस के लिए कर्जा कर पढ़ाए बच्चेे
सुजानगढ़. शहर में वार्ड १९ स्थित सांखला बास मोहल्ले के कन्हैयालाल बाड़ीवाल ब्राह्मण खुद नहीं पढ़ सके। मगर आर्थिक तंगी के बावजूद बच्चों को पढ़ाया। आज एक बेटा मुरलीधर (२५) अपने पिता के संघर्ष और अपनी मेहनत के दम पर राजस्थान मरुधर ग्रामीण बैंक कैरू (जोधुपर) में मैनेजर के पद पर कार्यरत है। बड़ी बेटी बबीता (35) सरकारी अध्यापिका है। छोटी बेटी कविता व दीपिका बीएड की पढ़ाई के साथ-साथ निजी स्कूलों में अध्यापिका हैं। कन्हैयालाल स्वयं नौवीं कक्षा व पत्नी बसंती छठी कक्षा पास है। भैंस का दूध बेचकर व मिर्च-धनिया पीसकर गृहस्थी चलाने वाले कन्हैयालाल के सामने कईबार ऐसी परिस्थितियां आई कि बच्चों की स्कूल फीस जमा कराने तक को रुपए नहीं होते थे। उस समय पत्नी ने पढ़ाई छुड़ाने की बात कही। मगर कन्हैयालाल ने परिचितों से रुपए उधार लेकर बच्चों को पढ़ाया। गौरतलब हैकि मुरलीधर को एक ही वर्ष में चार जगह से नियुक्ति पत्र मिले। पहले अलवर स्थित बैंक में लिपिक बने। यहां से झांसी स्थित बैंक में मैनेजर की नौकरी ग्रहण की। इसी दौरान विद्युत वितरण निगम से भी नियुक्ति पत्र मिल चुका है। आज भी कन्हैयालाल रोजाना दूध व मसाले की बकाया राशि वसूली के लिए दोपहर में दो घंटे पैदल ही उपभोक्ताओं के पास जाते हैं।
बेटे की पढ़ाई के लिए रख दी गिरवी पुश्तैनी जमीन
चूरू. शहर के गुलाबचंद प्रजापत परिवार की आर्थिक तंगी और परिस्थितियों के कारण खुद अधिक नहीं पढ़-लिख सके। मगर अपने बच्चों को अच्छा पढ़ा लिखाने की ख्वाहिश मन में थी। मगर पढ़ाईपर लगने वाले खर्चे की सोचकर निराश भी हो जाते थे।खुद १०वीं में फेल हो गए तो परिवार चलाने के लिए मटके बनाने के अपने पुश्तैनी काम में जुटगए। चार भाई-बहनों में सबसे छोटा बेटा किशन कुमार पढऩे में शुरू से होशियार था। उसे जैसे-तैसे करके 12वीं तक पढ़ाई करवाई। आगे किशन ने कॉमर्स लेकर सीए बनने की ठान ली। सीए की पढ़ाई पर लगने वाले खर्चे के जुगाड़ के लिए जानकारों से कर्जा लिया। बाद में परिवार के खर्चों और छोटी-मोटी सुविधाओं में कटौती करके बेटे को पढ़ाते रहे और कर्जा भी चुकाते रहे। मगर जब बड़ी राशि की जरूरत पड़ी तो अपनी जमीन गिरवी रखकर बेटे की पढ़ाई के लिए रुपए जुटाए। गुलाबचंद का जीवनभर का संघर्ष और किशन की मेहनत रंग लाई। आखिरकार किशन ने सीए की परीक्षा अच्छी रैंक से हासिल कर अपने पिता का सपना साकार कर दिया। आज किशन अच्छी कंपनी में सीए के पद पर कार्यरत है। गुलाबंचद के दो अन्य बेटे पढ़ लिखकर विदेश में काम कर रहे हैं। एक बेटी की शादी कर चुके हैं।
बेटियों को बनाया राज्य सेवा अधिकारी
रतनगढ़. शहर में वार्ड २४ निवासी सज्जन कुमार सांकृत्य ने अपनी अल्प आय में गुजारा कर बेटियों को पढ़ा-लिखाकर राज्य सेवा में अधिकारी बनाया है। शिक्षा विभाग में ३७ वर्ष तक लिपिकीय सेवा में कार्य करते हुए इन्होंने अपनी बेटियों को सफलता का मुकाम हासिल करवाया। सज्जन कुमार की बेटी कौशल्या का २०१० व मधुलिका का २०१२ की राज्य सेवा परीक्षा में चयन हुआ। वर्तमान में कौशल्या शिक्षा विभाग के शिक्षा संकुल में सतत शिक्षा अभियान जयपुर में मुख्य लेखाधिकारी के पद पर कार्यरत है। मधुलिका संभागीय वाणिज्य कर भवन जयपुर में कनिष्ठ राज्य कराधिकारी के पद पर कार्यरत है। दोनों बेटियां अपने ससुराल में रहती हैं। बेटियों की पढ़ाई के प्रति हर विकट परिस्थिति का सामना करने में सांकृत्य का इनकी पत्नी व पिता उमेशचंद्र सांकृत्य ने भी पूरा सहयोग किया।
Published on:
17 Jun 2018 11:49 am
