26 जुलाई 2026,

रविवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

Mirabai Chanu Struggle Story: आर्थिक तंगी के चलते चुनती थीं लकड़ियां, ऐसे वेटलिफ्टर बनी मीराबाई चानू, संघर्ष की कहानी ऐसी कि आंखों में आ जाएंगे आंसू

मीराबाई चानू बेहद गरीब परिवार से आती हैं। बचपन में आर्थिक तंगी के कारण उन्हें लकड़ी के गट्ठर उठाने पड़ते थे। ट्रेनिंग के दिनों में डाइट चार्ट फॉलो करना भी मुश्किल था, क्योंकि परिवार के पास दूध और चिकन जैसी चीजें खरीदने के पैसे नहीं होते थे।
2 min read
Google source verification

भारत

image

Siddharth Rai

Jul 26, 2026

mirabai Chanu

वेटलिफ्टर मीराबाई चानू ने ग्लासगो में लहराया तिरंगा(Photo: IANS/Biplab Banerjee)

Mirabai Chanu Struggle Story: ओलंपिक मेडलिस्ट मीराबाई चानू ने रविवार को ग्लासगो में कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारतीय वेटलिफ्टिंग के इतिहास में एक और सुनहरा अध्याय लिखा। चानू ने महिलाओं के 49 किग्रा वर्ग का खिताब जीतकर कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल की हैट्रिक पूरी कर ली। इसी के साथ उन्होंने गेम्स और कॉमनवेल्थ स्नैच रिकॉर्ड भी तोड़ दिए। नाइजीरिया की रूथ असुकुओ न्योंग (168 किग्रा) सिल्वर मेडलिस्ट रहीं, जो मीराबाई के विजयी प्रदर्शन से पूरे 22 किग्रा कम था। मलेशिया की आइरीन हेनरी ने कांस्य पदक हासिल किया।

कॉमनवेल्थ गेम्स में लगाई 'गोल्डन हैट्रिक'

मीराबाई चानू ने 2014 ग्लासगो में सिल्वर मेडल हासिल किया था। इसके बाद 2018 गोल्ड कोस्ट, 2022 बर्मिंघम और 2026 ग्लासगो में गोल्ड मेडल अपने नाम किए। 32 वर्षीय मीराबाई का जन्म 8 अगस्त 1994 को मणिपुर के नोंगपोक काकचिंग गांव में हुआ था। शुरुआत में उनका सपना तीरंदाज बनने का था, लेकिन परिस्थितियों ने उन्हें वेटलिफ्टिंग चुनने पर मजबूर किया।

बचपन में लकड़ी के गट्ठर उठाती थीं

वे बेहद गरीब परिवार से आती हैं। बचपन में आर्थिक तंगी के कारण उन्हें लकड़ी के गट्ठर उठाने पड़ते थे। ट्रेनिंग के दिनों में डाइट चार्ट फॉलो करना भी मुश्किल था, क्योंकि परिवार के पास दूध और चिकन जैसी चीजें खरीदने के पैसे नहीं होते थे। मीराबाई ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपनी मेहनत और लगन से न सिर्फ खुद को, बल्कि लाखों युवाओं के लिए नई राह बनाई। जब वह अपने घर में जलाने के लिए लकड़ी लाती थी तो अपने भाई से भी ज्यादा वजन वह आसानी से उठाकर ले आती थी, उस समय उनकी उम्र मात्र 12 साल की ही थी।

रियो ओलंपिक से पहले छोड़ना चाहती थीं वेटलिफ्टिंग

कुंजरानी देवी को वेटलिफ्टिंग करते देखकर मीराबाई इस खेल से आकर्षित हुईं। उन्होंने अपने माता-पिता को अपनी इच्छा बताई और काफी समझाने के बाद उन्हें इजाजत मिली। गांव में सुविधाओं की कमी के कारण अभ्यास के लिए उन्हें 50 किलोमीटर से ज्यादा की यात्रा करनी पड़ती थी। मात्र 13 साल की उम्र में उन्होंने ट्रेनिंग शुरू कर दी थी। रियो ओलंपिक की तैयारी के दौरान आर्थिक तंगी की वजह से वेटलिफ्टिंग छोड़ना चाहती थीं, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और क्वालीफाई किया। टोक्यो ओलंपिक में सिल्वर मेडल जीतकर उन्होंने देश का नाम रोशन किया।