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Vinod Kambli Birthday: कभी क्रिकेट के भगवान से होती थी तुलना, अब गुजार रहे गुमनामी की जिंदगी

विनोद कांबली की कहानी शानदार शुरुआत और अचानक पतन की मिसाल है। उनमें प्रतिभा की कभी कोई कमी नहीं थी, लेकिन उनके व्यवहार, अनुशासनहीनता और बिगड़ती छवि ने उनके करियर को सीमित कर दिया।

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vinod kambli birthday story of rise and fall of a great talent

पूर्व भारतीय खिलाड़ी विनोद कांबली (फोटो- ESPNcricinfo & IANS)

Rise and Fall of Vinod Kambli: भारतीय क्रिकेट ने कई महान खिलाड़ी दिए हैं, लेकिन कुछ कहानियां सफलता से ज्यादा सबक देती हैं। 1990 के दशक में एक ऐसा ही नाम उभरा, जिसने शुरुआत में पूरी दुनिया को चौंका दिया। यह कहानी है विनोद कांबली की, जिनकी बल्लेबाजी में आक्रामकता, आत्मविश्वास और भूख साफ नजर आती थीं। बेहद कम समय में रिकॉर्ड बनाने वाले कांबली का करियर उतनी ही तेजी से ढलान पर भी चला गया, जिससे उनका नाम धीरे-धीरे गुमनामी में चला गया। आज यानी 18 जनवरी को कांबली अपना 54वां जन्मदिन मना रहे हैं।

शिवाजी पार्क से टीम इंडिया तक का सफर

मुंबई के शिवाजी पार्क से निकले विनोद कांबली ने बचपन में ही क्रिकेट की दुनिया में अपनी पहचान बना ली थी। वे उसी स्कूल और उसी कोच के मार्गदर्शन में खेले, जहां सचिन तेंदुलकर ने क्रिकेट सीखा। स्कूल क्रिकेट में दोनों ने 664 रनों की ऐतिहासिक साझेदारी की, जिसने कांबली को रातोंरात सुर्खियों में ला दिया। इस साझेदारी में कांबली ने 349 रन की नॉट आउट पारी खेली थी। घरेलू क्रिकेट में शानदार प्रदर्शन के बाद कांबली को भारतीय टीम में मौका मिला और उन्होंने अपने शुरुआती टेस्ट मैचों में दोहरे शतक लगाकर चयनकर्ताओं का भरोसा जीत लिया।

भारत के लिए शानदार शुरुआत और रिकॉर्ड तोड़ प्रदर्शन

विनोद कांबली का टेस्ट करियर आंकड़ों के लिहाज से बेहद प्रभावशाली रहा। उन्होंने शुरुआती सात टेस्ट मैचों में ही 793 रन बनाए, जिसमें दो दोहरे शतक शामिल थे। उनका औसत 54 से ऊपर रहा, जो किसी भी युवा बल्लेबाज के लिए असाधारण माना जाता है। महज 14 टेस्ट पारियों में 1000 रन पूरे कर उन्होंने खास रिकॉर्ड बनाया था। उस समय वह भारत की ओर टेस्ट में सबसे तेज 1000 रन बनाने वाले खिलाड़ी बने थे। वनडे क्रिकेट में भी उन्होंने अहम पारियां खेलीं और एक समय उनका औसत कई दिग्गज बल्लेबाजों से बेहतर था। उस दौर में लग रहा था कि भारतीय क्रिकेट को एक और सुपरस्टार मिल गया है।

अनुशासन की कमी और गिरता ग्राफ

हालांकि, प्रतिभा के साथ अनुशासन और निरंतरता का अभाव कांबली के करियर पर भारी पड़ गया। शॉर्ट बॉल के खिलाफ कमजोरी, फिटनेस पर ध्यान न देना और मैदान के बाहर का व्यवहार चयनकर्ताओं को खटकने लगा। 1996 विश्व कप के बाद उनका प्रदर्शन गिरता चला गया और धीरे-धीरे टीम में उनकी जगह खतरे में पड गई। कुछ भावनात्मक पलों और विवादित बयानों ने भी उनकी छवि को नुकसान पहुंचाया, जिसका असर उनके करियर पर साफ दिखा। इन्हीं सबके बीच उनका नाम अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से गायब हो गया।

क्रिकेट के बाद की जिंदगी और सीख

क्रिकेट से बाहर होने के बाद विनोद कांबली ने फिल्मों, कमेंट्री और अन्य क्षेत्रों में हाथ आजमाया, लेकिन उन्हें वह पहचान दोबारा नहीं मिल सकी। उनकी कहानी यह सिखाती है कि सिर्फ टैलेंट ही नहीं, बल्कि धैर्य, अनुशासन और सही मार्गदर्शन भी उतना ही जरूरी है। विनोद कांबली का उत्थान और पतन आज भी युवाओं के लिए एक अहम सबक है कि सफलता को संभालना, उसे पाना जितना ही मुश्किल होता है।