6 जनवरी 2026,

मंगलवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

होम

video_icon

शॉर्ट्स

catch_icon

प्लस

epaper_icon

ई-पेपर

profile_icon

प्रोफाइल

श्रीराम का अगला पड़ाव था इंजरम, जहां महाकाल की थी स्थापना

श्रीराम संस्कृतिक शोध संस्थान न्यास, नई दिल्ली ने श्रीराम वनगमन स्थल के रूप में रामाराम को सालों पहले चिह््ित कर दिया था।

2 min read
Google source verification
CG News

श्रीराम का अगला पड़ाव था इंजरम, जहां महाकाल की थी स्थापना

सुकमा. त्रेतायुग में भगवान श्रीराम ने अपने वनवास काल के दौरान दक्षिण की ओर बढऩे के वक्त उन्होंने रामाराम जहां वर्तमान में मंदिर है। वहां भू देवी की आराधना की थी। जहां आज स्थानीय देवी देवताओं के साथ भव्य मेला लेगेगा। श्रीराम संस्कृतिक शोध संस्थान न्यास, नई दिल्ली ने श्रीराम वनगमन स्थल के रूप में रामाराम को सालों पहले चिह््ित कर दिया था।

अस्था का प्रमुख केन्द्र
छत्तीसगढ़ में भगवान श्रीराम के राम वनगमन के अनुसार कुुंटुमसर से सुकमा होते हुए शबरी नदी के तट पर स्थित रामाराम पहुंचे। आज यह स्थल मां रामारामीन चिट्मिटिन अम्बा देवी मंदिर से क्षेत्र में प्रसिद्ध है। जानकारों के अनुसार श्रीराम ने भू देवी (धरती देवी) की यहां पूजा की थी। यहां पर प्रतिवर्ष फरवरी माह में लगाने वाले मेले स्थानीय देवी-देवताओं के साथ श्रीराम की पूजा भी की जाती है।

क्षेत्र के आदिवासियों के अस्था का प्रमुख केन्द्र है। वही इसके बाद श्रीराम इंजरम पहुंचकर भगवान शिव की स्थापना कर महाकाल को मनाया था। जिसके भग्नावशेष आज भी यहां है। जिसके प्रमाण क्षतविक्षत स्थिति में पेड़ों के नीचे रखी मुर्तियां हैं। जिसकी इंजरम के ग्रामीण पूजा पाठ करते है।

आदिकाल से लगते आ रहा हैं मेला

यहां पर आदिकाल से मेले का आयोजन होता आ रहा है। बस्तर के इंतिहास के अनुसार 608 सालों से यहां मेला आयोजन होता आ रहा है। वही सुकमा जमीदार परिवार रियासत काल से यहां पर देवी.देवताओं की पूजा करते आ रहे है। यहां पर प्रतिवर्ष फरवरी माह में भव्य मेला का आयोजन होता है। जिसमें बडी संख्या में क्षेत्र के श्रद्वालू मंदिर पहुंचकर माता के दर्शन करते है। सुकमा जिल में लगाने वाला पहला सबसे बड़ा मेला होता है। इसके बाद पूरे क्षेत्र में गांव-गांव में मेले का दौर प्रारंभ होता है।

पहले शामिल होते थे विदेशी सैलानी
माओवादी वारदातों के चलते इसका असर अब मेले में भी देखने को मिलता है। वही सालों पहले मेले देखने के लिए आस-पास पडोसी राज्य के अलावा। विदेशी पर्यटक भी मेले का लुफ्त उठाने के लिए पहुंचते थे। लेकिन अब माओवादी वारदातों के कारण विदेशी पर्यटक भी यहां से दूरी बना ली है। माओवाद का असर इस मेले में भी पडा है। जिसके कारण पहले के मुकाबले इस मेले को देखने के लिए पड़ोसी राज्य तेलंगाना, ओडिशा से बड़ी संख्या में लोग देखने के लिए पहुंचते थे। लेकिन अब मेला देखने के लिए बाहर से आने वाले पर्यटकों में कमी आई है।