1 मार्च 2026,

रविवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

विश्व प्रसिद्ध दंतेवाड़ा फागुन मड़ई: द्वादशी की सप्तम पालकी में उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब, आस्था का दिखा अद्भुत संगम

Dantewada Fagun Madai: विश्व प्रसिद्ध दंतेवाड़ा फागुन मड़ई के द्वादशी की सप्तम पालकी में मां दंतेश्वरी और मां भद्रकाली का छत्र नगर भ्रमण हुआ।

2 min read
Google source verification
विश्व प्रसिद्ध दंतेवाड़ा फागुन मड़ई (photo source- Patrika)

विश्व प्रसिद्ध दंतेवाड़ा फागुन मड़ई (photo source- Patrika)

Dantewada Fagun Madai: विश्व प्रसिद्ध फागुन मड़ई में द्वादशी की सप्तम पालकी एवं गंवरमार का दिन ऐतिहासिक और आध्यात्मिक ²ष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। इस पावन अवसर पर मां दंतेश्वरी की डोली के साथ मां भद्रकाली का छत्र नगर भ्रमण पर निकला। शोभायात्रा में बस्तर नरेश कमल चंद्र भंज देव स्वयं पैदल चलते हुए शामिल हुए, जो आस्था और परंपरा का अद्भुत संगम रहा।

Dantewada Fagun Madai: स्थानीय परंपरा में देवी का प्रतीक

मां दंतेश्वरी की डोली निकलते ही पूरा नगर भक्ति और उत्साह से सराबोर हो उठा। मान्यता है कि गंवरमार के दिन माता अपने क्षेत्रवासियों को विशेष आशीर्वाद देने निकलती हैं। इस अवसर पर मां भद्रकाली का छत्र भी डोली के साथ रहा, जिसे स्थानीय परंपरा में देवी का प्रतीक रूप माना जाता है। फागुन मड़ई में लगभग 900 से 1000 गांवों से देवी-देवताओं की डोलियां पहुंचती हैं, जिससे यह आयोजन महासंगम का रूप ले लेता है। अलग-अलग क्षेत्रों से आए देवी-देवताओं की उपस्थिति मेले की भव्यता को और मनोहारी बनाती है।

देवी देवताओं का मिलन

साथ ही जो बड़े बुजुर्ग है दिगर जाति के लोग हैं जो माता के दर्शन के लिए नहीं आ पाते हैं माता खुद आज अपने दर्शन देने के लिए निकलती है और नगर में सुख शांति बनाए रखने के लिए माता मावली ,माता दंतेश्वरी और मेले मंडई जिले से आए समस्त देवी देवताओं का एक मिलन होता है यही मेले की खासियत होती है।

Dantewada Fagun Madai: रियासत काल से इस दिन गंवरमार शिकार की परंपरा

गंवरमार के अवसर पर बस्तर राजा की सहभागिता बस्तर की जीवंत परंपरा को दर्शाती है, जहां राजा स्वयं को माता का प्रथम सेवक मानते हैं। उन्होंने बताया कि रियासत काल से इस दिन गौरमार शिकार की परंपरा रही है। पहले भैंस की बलि दी जाती थी, जिसे समय के साथ बदलकर अब प्रतीकात्मक रूप में निभाया जाता है।