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शैक्षणिक योग्यता की अनिवार्यता हटाते ही जगी उम्मीद

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दौसा. कांग्रेस सरकार ने मंत्रिमण्डल की पहली बैठक में पंचायत व निकाय चुनावों में शैक्षणिक योग्यता की अनिवार्यता हटाने की घोषणा से कई नेताओं की उम्मीदें फिर जाग उठी हैं। पिछले चुनाव के करीब 96 सरपंच ऐसे हैं, जिनके खिलाफ शैक्षणिक योग्यता के फर्जी दस्तावेज लगाने के मामले दर्ज हुए थे। अब कांग्रेस सरकार के आते ही शैक्षणिक योग्यता की अनिवार्यता खत्म होते ही फिर से वे लोग एक साल बाद होने वाले पंचायत चुनावों के लिए सक्रिय होने की सोचने लगे हैं।

खासकर वे पुराने नेता जिनके जमाने में पढ़ाई पर कम ध्यान दिया जाता था, उनमें अधिक खुशी है। सरकार की घोषणा से पूर्व पंचायत चुनाव लडऩे की इच्छा रखने वाले कई ग्रामीण नेताओं ने बुढ़ापे में पढ़ाई करना शुरू कर दिया था। कुछ ने स्कूलों में दाखिला भी ले लिया था। हालांकि युवाओं व पढ़े-लिखे लोगों में सरकार के इस निर्णय की आलोचना भी सुनाई दे रही है।

तब रह गए थे वंचित


वर्ष 2015 के पंचायत आम चुनाव के लिए भाजपा सरकार ने शैक्षणिक योग्यता अनिवार्य कर दी थी। इसमें सरपंच के लिए आठवीं, पंचायत समिति सदस्य व जिला परिषद सदस्य के लिए 10वीं पास की शैक्षणिक योग्यता निर्धारित की गईथी । अचानक शैक्षणिक योग्यता निर्धारित करने से ग्रामीण इलाकों के नेता बनने का सपना कई लोगों का अधूरा रह गया था। इसी प्रकार निकाय चुनावों में भाग्य आजमाने वालों के सामने भी शैक्षणिक योग्यता 10वीं पास होने से उनके भी अरमान धरे के धरे रह गए थे।

परिजनों को उतारा था


गांवों में पंचायत चुनावों में कई नेताओं के सामने शैक्षणिक योग्यता आड़े आ गई थी, उनमें से अधिकांश ने अपने परिवार के पढ़े-लिखे लोगों को चुनावी मैदान में उतारा था। किसी ने बेटे को तो किसी ने पुत्रवधु को चुनाव लड़वाया था।

फर्जी टीसी के मामले आए थे सामने


वर्ष 2015 के पंचायत आम चुनाव में सरपंच पद पर जीतने वालों के जगह-जगह से फर्जी टीसी के कई मामले सामने आए थे। जिले की 234 ग्राम पंचायतों में से 96 सरपंच के खिलाफ फर्जी मार्कशीट प्रस्तुत करने के मामले दर्ज हुए। इनमें से कइयों के पद तो जा चुके हैं और अधिकांश के मामले अभी भी न्यायालयों में चल रहे हैं। कई सरपंचों ने तो जेल की हवा भी खाई।

जो फंसे हैं, उनका क्या होगा


पंचायत चुनाव 2015 में फर्जी अंकतालिका लगाकर चुनाव लडऩे वालों के मामले न्यायालय में चल रहे हैं। अब ऐसे मामलों में फंसे नेताओं के सामने सवाल है कि क्या सरकार उनके मुकदमे वापस लेगी या फिर चलते रहेंगे। कइयों पर अब भी पद छिनने की तलवार लटकी हुई है।