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मां ना बाप, कौन करे बेटी के पीले हाथ

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मां ना बाप, कौन करे बेटी के पीले हाथ

दौसा ग्रामीण. कुण्डल. कभी भरा-पूरा परिवार था, लेकिन विधाता की नियति कुछ ऐसी हुई कि मां की मौत के ठीक वर्ष भर बाद ही पिता भी बीमारी के कारण चल बसे। ऐसे में दो छोटे भाई-बहन ही एक दूजे का सहारा बने हुए हैं। रोजाना अलसुबह नवीं कक्षा में अध्यनरत छोटा भाई सुबह घर-घर जाकर आटा मांगकर लाता है। उसके बाद बमुश्किल दो जून की रोटी का इंतजाम हो पाता है। ऐसे में बिजली, पानी एवं गैस कनेक्शन सहित अन्य सुविधाओं की तो बात ही बेमानी है। यह व्यथा है बास गुढ़लिया निवासी 14 वर्षीय पवन एवं उसकी 22 वर्षीय अविवाहित सीता योगी की।


दरअसल ग्राम पंचायत गुढलिया के बास गुढ़लिया निवासी मिश्रीदेवी की वर्ष 2014 में मौत के सही एक वर्ष बाद फरवरी 2015 में उसके पति कैलाशचन्द्र योगी की भी बीमारी के कारण मौत हो गई। दोनों भाई एवं बहन ही एक दूसरे का सहारा है।
खेलने-कूदने की उम्र में नवीं कक्षा में अध्यनरत पवन घर-घर आटा मांगकर लाता है, तब जाकर दो जून की रोटी का इंतजाम हो पाता है। हालांकि इनकी आर्थिक स्थिति को देखते हुए सरकारी विद्यालय की ओर से उसका विकास शुल्क तो माफ कर दिया, लेकिन अन्य शुल्क देने पड़ते हैं।


बहन ने तो कभी स्कूल की दहलीज पर कदम ही नहीं रखा। अलग से राशनकार्ड नहीं होने के कारण इन्हें सरकारी योजनाओं का समुचित लाभ भी नहीं मिल पाता है। हालांकि इनके चाचा भी इसी आंगन में रहते हैं, लेकिन वे भी अक्सर बीमार रहते हंै। वे बताते है कि उनके एक ही किडनी है। इससे भारी-भरकम काम करना उनके बस की बात नहीं है। ऐसे में अपनी भतीजी की शादी की चिंता सताए रहती है।

शौचालय भी नहीं बन सका


स्वच्छ भारत मिशन के तहत जिले में सरकारी सहायता से लाखों शौचालयों का निर्माण हुआ है, लेकिन सरकारी व्यवस्था
का ढर्रा यह है कि बेसलाइन सर्वे में नाम नहीं होने के कारण उनके घर में शौचालय तक नहीं बन सका है। ऐसे में निवृत्त होने के लिए बाहर ही जाना पड़ता है। खास बात यह है कि जिस जगह पर वह रहते हैं, वह भी सरकारी चरागाह भूमि है।