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चार बालिकाओं का दर्द, पिता का साया उठते ही जननी भी छोड़ गई

The pain of the four poor girls in dausa : सहायता के लिए उपजिला कलक्टर के पास पहुंची
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The pain of the four poor girls in dausa

चार बालिकाओं का दर्द, पिता का साया उठते ही जननी भी छोड़ गई

दौसा. तीन महीने पहले सिर से पिता का साया उठ गया और फिर डेढ़ माह बाद जननी भी छोड़ कर फरार हो गई। अब 80 वर्षीय दादी के पास रह कर गुजर बसर कर रही हैं चार अनाथ मासूम बहनें (four poor girls)। इन चारों बालिकाओं को देख कर एक बार तो हर किसी का दिल भर आता है। इनमें से तीन बहनों को तो अभी यह भी सुध-बुध नहीं है कि उनके पिता अल्लाह को प्यारे हो गए और फिर मां भी उनको अकेला छोड़ गई।


यह कहानी दौसा जिला मुख्यालय के नागौरी मोहल्ले की चार बहनों की है। इनका रखवाला इस वक्त मात्र अस्सी वर्षीय बूढ़ी दादी है। दादी की भी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है जो कि उनकी देखभाल कर सके। इनको सरकारी मदद दिलाने के लिए टैक्सी यूनियन अध्यक्ष नौशाद अली पाशा प्रयास कर रहे हैं। नौशाद शुक्रवार को इन चारों बहनों को लेकर उपजिला कलक्टर डॉ. गोवर्धनलाल शर्मा के पास लेकर गए। एसडीओ ने सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग के सहायक निदेशक राजेन्द्र गुर्जर को बुलाकर बालिकाओं को पालनहार योजना समेत अन्य योजनाओं का लाभ दिलाने के निर्देश दिए। सहायक निदेशक ने बालिकाओं को लाभान्वित कराने के लिए आवेदन तैयार कराए।



मैं तो पढऩा चाहती हूं...


दौसा शहर के नागौरी मोहल्ले में रहने वाली 8 वर्षीय सिमरन, 6 वर्षीय शानिया, 4 वर्षीय मुस्कान व दो वर्षीय आयशा मदद के लिए कलक्ट्रेट में खड़ी थी। सिमरन ने दो वर्षीय आयशा को गोद में ले रखा था। जब पत्रिका संवाददाता ने बड़ी बालिका सिमरन से उनके मम्मी व पापा के लिए पूछा तो उसकी आंखें नम हो गई। उसने बताया कि पापा जाकिर खान की तीन महीने पहले बीमारी से मौत हो गई।

उनके पापा की मौत के कुछ दिन बाद ही उनकी मां भी कहीं चली गई। छोटी बहनें मम्मी-पापा को याद करती है। उसने चौथी कक्षा तक पढ़ाई भी की, लेकिन अब पढ़ाई छूट गई। अब भी वह पढ़ाई करना चाहती है। छोटी बहनों को अभी भी अपने मम्मी-पापा के बारे में सुध-बुध नहीं है।

पिता भी मजदूरी करते थे


बालिकाओं को मदद के लिए कलक्ट्रेट लेकर आए नौशाद अली ने बताया कि बच्चियों के पिता जयपुर में बसों पर कण्डक्टरी का काम कर परिवार का पालन पोषण कर रहा थे। तीन महीने पहले बीमारी से उनकी मौत हो गई। मां के भी जाने के बाद मोहल्ले वाले मदद करते हैं, लेकिन वे भी कब तक करेंगे। अली ने बताया कि इन बालिकाओं के चाचा हैं, लेकिन वे भी दिहाड़ी मजदूरी करते हैं। उनकी भी आर्थिक स्थिति खराब है।

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